Narayani Sewa Samiti (नारायणी सेवा समिति)

शरणागत भाव से की गई सेवा और नाम स्मरण व्यक्ति को शीघ्र ही परमात्मा प्राप्ति कराता है| परन्तु सेवा में स्वतः स्मरण हो जाने से सेवा का महत्त्व बड़ा हो जाता है। सेवा अहंकार का भी नाश करती है|
सेवा के महत्त्व के बारे में भाष्यकार रामानुज स्वामी कहते हैं -
कैंकर्य लक्ष्ण विलक्षण मोक्ष भाज:।
अर्थात जब व्यक्ति में कैंकर्य भाव अर्थात सेवा भाव उत्पन्न हो जाता है तो वह मोक्ष का अधिकारी हो जाता है|
भगवान श्रीकृष्ण भी गीता में कहते हैं –
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतेहिते रता: । (12/4)
अर्थात् वे मुझे यानि परमात्मा को ही प्राप्त होते हैं जो प्राणीमात्र के हित में लगे हुए हैं।
आप जानते ही होंगे कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पत्तल उठाई थी। भगवान श्रीराम भी जब मतंग ऋषि के आश्रम में गये। तो वह वहाँ वेदपाठी, तपस्वी, मुनि, योगियों के पास न जाकर सीधे शबरी के पास गये। बेशक बूढ़ी शबरी एक अनपढ़, गंवार और शूद्र वर्ण से सम्बन्ध रखती थी, लेकिन सेवा में उसका कोई सानी नहीं था| भगवान् ने तो उसे भक्ति की आचार्या भी कहा!
सेवा से जुड़ने के आप कभी भी आ सकते है!
जय गुरु देव जी।।🙏🙏