Shri KahanGuru Pathshala
1129 - मुमुक्षुओंको और ज्ञानियोंको अपवादमार्ग या उत्सर्गमार्ग का आग्रह या हठ नहीं होता - संबंधित
1128-जिन्हें शुद्ध स्वभावकी दृष्टि हुई है- उनको सब आत्मा सिद्ध पने- चैतन्य पने ही भासते है -संबंधित
1126- पूज्य गुरुदेवश्री को श्रुत की लब्धि है - पूज्य बहनश्री
1127 - पुरुषार्थ करने की कला आ जाये तो मार्ग की भ्रमणा मिट जाये- संबंधित
1125 - रुचि से लेकर केवलज्ञान तक पुरुषार्थ ही चाहिए - संबंधित
1124 - आत्मास्वरूप प्राप्ति की यथार्थ भूमिकामें कैसा होता है? संबंधित
1123 - आगमव्यवहार और अध्यात्मव्यवहार - संबंधित
1120 - जैसे म्यान तलवार नहीं है, वैसे पुद्गल के परिणाम जीव नहीं है- संबंधित
1117 - बंध के कारण क्या नहीं है? संबंधित
1122 - शास्त्रों में अचेतन ३ प्रकार से कहने में आया है- संबंधित
1121 - गुणस्थान, मार्गणास्थान इत्यादि पर्यायों को पुदगल के परिणाम कहने में क्या प्रयोजन है?-संबंधित
1119 - मुख्य बंध - संबंधित
1118 - अंतरंगकी अपेक्षासे अविरत सम्यक्दृष्टि और देशव्रती श्रावक निर्बन्ध है - संबंधित
1116 - उपयोगमें रागादिकरण वह बंध का कारण है - संबंधित
1115 - व्यवहारनय को अभूतार्थ और शुद्धनय को भूतार्थ क्यों कहने में आता है? - संबंधित
1114 - बंध का मुख्य कारण- संबंधित
1112 - भेदज्ञानी गृहस्थ पुरुषने क्या करना चाहिए - संबंधित
1113 - रत्नत्रयसे बंध होता नहीं पर साथ रहे हुए शुभ कषायसे बंध होता है - संबंधित
1111 - क्रमबद्ध और पुरुषार्थ संबंधित
1110 - जन्म - मरण के चक्र से छूटने के लिए क्या करना चाहिए? - संबंधित
1107 - ज्ञानी की परिणति सहज होती है! - संबंधित
1102 - जगत के जीव मिथ्यात्वभाव से नाच रहे है- संबंधित
1103 - बंधको नाश करनेवाला सम्यक्ज्ञान कैसा है - संबंधित
1105 - शुभ भाव कैसे है? संबंधित
1106 - विभाव परिणाम विद्यमान दिखते है, फिर भी उसको अवस्तु क्यों कहा? संबंधित
1108 - ज्ञान और वैराग्य एक दूसरे को प्रोत्साहन देने वाले कैसे है - संबंधित
1109 - नरकमें भी सम्यकदृष्टि को शील होता है! - संबंधित
1104-जीव के शुद्ध स्वरूप को अनुभवते हुए,जो भाव जीव स्वरूप भासित नहीं होते,वे जीव से भिन्न है संबंधित
1101 - निर्जरा अधिकार के सार संबंधित
1100 - मिथ्यात्व और रागादि का त्याग वह नाम मात्र है - संबंधित