कबिर भजन / सारी उमरिया गई धोखे में, Kabir Amritwani, Sant Kabir Ke Popular Dohe
Автор: जीवन गीत
Загружено: 2026-01-04
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कबीर भजन
(मुखड़ा )
सारी उमरिया गई धोखे में, साँचो ना पायो रे मनवा,
माया के रंग में रंग गयो रे, झूठी लाज निभायो रे मनवा।
हा रे मनवा… ओ रे मनवा…
साँचो ना पायो रे मनवा॥
(अंतरा 1)
माटी का तन, माटी में मिलना, घमंड काहे को भाई,
चार दिन की ये चकाचौंध, फिर अँधियारा छाई।
धन-दौलत सब यहीं रह जावे, संग ना जावे कोई,
कबीरा समझा-समझा हार गया, फिर भी चेत्या न कोई।
हा रे मनवा… ओ रे मनवा…
साँचो ना पायो रे मनवा॥
(अंतरा 2)
मंदिर-मस्जिद, तीर्थ-ब्रत में, ढूँढे तू भगवान,
मन के भीतर जो बैठा है, उसको ना पहिचान।
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, जाने सोई होय।
हा रे मनवा… ओ रे मनवा…
साँचो ना पायो रे मनवा॥
(अंतरा 3)
काम-क्रोध मद लोभ की गठरी, सिर पर ढोता जाए,
साँस-साँस में नाम सिमर ले, भवसागर तर जाए।
गुरु की पकड़ ले ऊँगली, राह अपने आप खुले,
अहंकार की गाँठ खुले जब, भीतर दीपक जले।
हा रे मनवा… ओ रे मनवा…
साँचो ना पायो रे मनवा॥
(अंतरा 4)
ना मैं हिन्दू, ना मैं मुसलमान, ना कोई ऊँच-नीच,
प्रेम-प्रीत के रंग में रंग जा, मिट जाए हर दीच।
कबीरा कहे सुनो रे सज्जन, ये जग है सराय,
आज यहाँ, कल वहाँ, फिर किस पर इतरा जाए।
हा रे मनवा… ओ रे मनवा…
साँचो ना पायो रे मनवा॥
(समापन / दोहराव)
सारी उमरिया गई धोखे में, साँचो ना पायो रे मनवा,
माया के जाल से छूट के देख, नाम में खो जा रे मनवा।
हा रे मनवा… ओ रे मनवा…
अब तो साँचो पा ले रे मनवा॥
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