DR M K SAHANI MESSAGE ON 27 JANUARY INTERNATIONAL HOLOCAUST REMEMBRANCE DAY
Автор: Dr. Mridul Kumar Sahani
Загружено: 2026-01-26
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27 JANUARY INTERNATIONAL HOLOCAUST REMEMBRANCE DAY
27 जनवरी – अंतरराष्ट्रीय होलोकॉस्ट स्मृति दिवस
आज 27 जनवरी है—एक ऐसी तिथि जो मानव इतिहास के सबसे अंधकारमय अध्याय की स्मृति को हमारे सामने जीवित कर देती है। यह दिन अंतरराष्ट्रीय होलोकॉस्ट स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है। यही वह दिन है जब वर्ष 1945 में ऑशविट्ज़–बिर्केनाउ यातना शिविर को मुक्त किया गया और दुनिया ने मानवता के खिलाफ किए गए सबसे बड़े अपराधों की भयावह सच्चाई को देखा।
होलोकॉस्ट केवल इतिहास की एक घटना नहीं है। यह उन लाखों निर्दोष आत्माओं की चीख है, जिनकी पहचान, गरिमा और जीवन को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया गया। यह याद दिलाता है कि जब घृणा को विचारधारा बना दिया जाता है, जब किसी एक समुदाय को “कमतर” मान लिया जाता है, तब सभ्यता कितनी आसानी से क्रूरता में बदल सकती है।
साथियों,
होलोकॉस्ट का दर्द केवल शारीरिक नहीं था—वह मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक स्तर पर भी था। भय, अपमान, निराशा, अलगाव और निरंतर मृत्यु की आशंका—इन सबने मानव मन को अंदर तक तोड़ दिया। यह सामूहिक आघात (collective trauma) था, जिसके प्रभाव पीढ़ियों तक चले गए।
यहीं से हम होम्योपैथिक दृष्टिकोण को समझ सकते हैं। होम्योपैथी केवल शरीर के रोगों का उपचार नहीं करती; वह मन, शरीर और आत्मा—तीनों को एक समग्र इकाई मानती है। होम्योपैथी यह स्वीकार करती है कि जब मन पर गहरा आघात पड़ता है, तो उसका प्रभाव शरीर और जीवन-शक्ति (vital force) पर अवश्य पड़ता है।
होलोकॉस्ट के पीड़ितों में केवल कुपोषण या संक्रमण नहीं था—उनमें अत्यधिक भय, गहरा शोक, अपमान की अनुभूति और भविष्य के प्रति पूर्ण निराशा थी। होम्योपैथिक भाषा में कहें तो यह जीवन-शक्ति का गहन विघटन था। और आज भी, युद्ध, नरसंहार, आतंकवाद या सामाजिक भेदभाव झेलने वाले लोग उसी प्रकार के मानसिक घाव लेकर जी रहे हैं।
इस स्मृति दिवस का संदेश केवल “याद करना” नहीं है, बल्कि संवेदनशील बनना है। होम्योपैथी हमें सिखाती है कि हर रोगी को उसकी कहानी के साथ देखो—उसके डर, उसके दुःख और उसकी चुप्पी को सुनो। उसी तरह, समाज को भी इतिहास की पीड़ा को सुनना होगा, ताकि वह दोबारा न दोहराई जाए।
आज की दुनिया में भी जब हम घृणा, नस्लवाद, धार्मिक असहिष्णुता और युद्ध को देखते हैं, तो होलोकॉस्ट हमें चेतावनी देता है। यह हमें याद दिलाता है कि बीमारी केवल शरीर की नहीं होती—समाज भी बीमार हो सकता है। और उस बीमारी का उपचार करुणा, जागरूकता और नैतिक जिम्मेदारी से ही संभव है।
प्रिय विद्यार्थियों,
होलोकॉस्ट स्मृति दिवस हमें यह सिखाता है कि मौन भी अपराध बन सकता है। जब अन्याय हो और हम चुप रहें, तो हम भी उस पीड़ा के भागीदार बन जाते हैं। होम्योपैथी की तरह, जो सूक्ष्म संकेतों को भी महत्व देती है, हमें समाज में हो रहे छोटे-छोटे अन्याय को भी पहचानना और रोकना सीखना होगा।
अंत में,
आज हम उन लाखों आत्माओं को नमन करते हैं, जिन्होंने असहनीय यातनाएँ सही। हम यह संकल्प लेते हैं कि मानव गरिमा, करुणा और सह-अस्तित्व के मूल्यों को कभी मरने नहीं देंगे। स्मरण केवल अतीत के लिए नहीं होता—वह भविष्य को सुरक्षित करने के लिए होता है।
“Never Again”—यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि मानवता के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
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