Namami Shamishan | शिव की महिमा | नमामीशमीशान| शिव भजन | Shiva's Divine Presence
Автор: DIVINE_DEN
Загружено: 2026-01-02
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निर्वाणरूपं (Nirvana रूपं): जो निर्वाण (मोक्ष) का रूप है
विभुं (Vibhu): जो सर्वव्यापक है
व्यापकं (Vyapakam): जो सबमें व्याप्त है
ब्रह्मवेदस्वरूपम् (Brahma-veda-svarupam): जो ब्रह्म और वेदों का स्वरूप है
यह श्लोक भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है, जो निर्वाण का रूप हैं, सर्वव्यापक हैं, और ब्रह्म और वेदों के स्वरूप हैं 🙏।
निजं (Nijam): जो अपने आप में स्थित है
निर्गुणं (Nirgunam): जो गुणों से परे है
निर्विकल्पं (Nirvikalpam): जो विकल्पों से रहित है
निरीहं (Niriham): जो इच्छाओं से मुक्त है
चिदाकाशम् (Chidakasham): जो चेतना का आकाश है
आकाशवासं (Akashavasam): जो आकाश में निवास करता है
भजेहम् (Bhajeham): मैं उसको नमस्कार करता हूँ
यह श्लोक भगवान शिव की निर्गुण और निर्विकल्प स्वरूप का वर्णन करता है, जो चेतना के आकाश में निवास करता है 🙏।
निराकारम् (Nirakaram): जो आकार से रहित है
ओंकारमूलं (Omkaramulam): जो ओमकार का मूल है
तुरीयं (Turiyam): जो तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे है
गिराज्ञानगोतीतमीशं (Girajnan-gotitam Isham): जो वाणी और ज्ञान से परे है
गिरीशम् (Girisham): जो गिरि (पर्वत) का स्वामी है
यह श्लोक भगवान शिव की निराकार और ओमकार स्वरूप का वर्णन करता है, जो तीनों अवस्थाओं से परे है और वाणी और ज्ञान से परे है 🙏।
करालं (Karalam): जो भयंकर है
महाकालकालं (Mahakalakalam): जो महाकाल का भी काल है
कृपालं (Krupalum): जो कृपा करने वाला है
गुणागारसंसारपारं (Gunagar-samsaraparam): जो गुणों का घर है और संसार से पार है
नतोहम् (Natoham): मैं उसको नमस्कार करता हूँ
यह श्लोक भगवान शिव की महाकाल स्वरूप का वर्णन करता है, जो भयंकर और कृपालु है, और गुणों का घर है 🙏।
तुषाराद्रिसंकाशगौरं (Tusharadri-sankasha-gauram): जो हिमालय के समान गौरवर्ण हैं
गभिरं (Gabhiram): और गम्भीर हैं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् (Manobhutakoti-prabhashri-shariram): जिनका शरीर करोड़ों मन और भूतों की प्रभाश्री से युक्त है
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा (Sphurannmouli-kallolini-charu-ganga): जिनके मस्तक पर गंगा की धारा बह रही है
लसद्भालबालेन्दु (Lasad-bhala-balendu): जिनके मस्तक पर चमकता हुआ चंद्रमा है
कण्ठे भुजङ्गा (Kanthe-bhujanga): और कंठ में भुजंग (सर्प) है
चलत्कुण्डलं (Chalat-kundalam): जिनके कान में कुंडल झूल रहे हैं
भ्रूसुनेत्रं विशालं (Bhrusu-netram visalam): जिनकी भौंहों के बीच तीसरा नेत्र विशाल है
प्रसन्नाननं (Prasan-nanam): जिनका मुख प्रसन्न है
नीलकण्ठं (Nilakantham): जिनका कंठ नीला है
दयालम् (Dayalam): जो दयालु हैं
मृगाधीशचर्माम्बरं (Mrigadheesh-charmambaram): जो मृगाधीश (व्याघ्र) की चर्म धारण करते हैं
मुण्डमालं (Mundamalam): और मुण्डों की माला पहनते हैं
प्रियं शङ्करं (Priyam Shankaram): जो प्रिय शंकर हैं
सर्वनाथं (Sarva-natham): और सर्वनाथ हैं
भजामि (Bhajami): मैं उनकी भक्ति करता हूँ
और आगे कहते हैं:
प्रचण्डं (Prachandam): जो प्रचण्ड हैं
प्रकृष्टं (Prakrstam): और उत्कृष्ट हैं
प्रगल्भं (Pragalbham): और प्रगल्भ (निडर) हैं
परेशं (Paresham): और परमेश्वर हैं
अखण्डं (Akhndam): जो अखण्ड हैं
अजं (Ajam): और अजन्मा हैं
भानुकोटिप्रकाशं (Bhanu-koti-prakasham): और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान हैं
त्र्यःशूलनिर्मूलनं (Tryashula-nirmulanam): जो तीनों शूलों (आधिभौतिक, आधिदैविक, और आध्यात्मिक) का नाश करते हैं
शूलपाणिं (Shulapanim): और शूल (त्रिशूल) धारण करते हैं
भजेहं (Bhajeham): मैं उनकी भक्ति करता हूँ
भवानीपतिं (Bhavani-patim): जो भवानी (पार्वती) के पति हैं
भावगम्यम् (Bhava-gamyam): और भाव (प्रेम) से प्राप्त होने वाले हैं 🙏।
कलातीतकल्याण (Kalatitkalyan): जो काल से परे हैं और कल्याण स्वरूप हैं
कल्पान्तकारी (Kalpantakari): जो कल्प के अंत में सब कुछ संहार करते हैं
सदा सज्जनानन्ददाता (Sada sajjananandadata): जो सज्जनों को सदा आनंद देते हैं
पुरारी (Purari): और पुरों (शहरों) का नाश करने वाले हैं
चिदानन्दसंदोह (Chidanandasandoha): जो चिदानंद का समुद्र हैं
मोहापहारी (Mohapahari): और मोह का नाश करते हैं
प्रसीद प्रसीद प्रभो (Prasida prasida prabho): हे प्रभो! मुझ पर प्रसन्न हों
मन्मथारी (Manmathari): जो कामदेव के शत्रु हैं
यह श्लोक भगवान शिव के दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है, जो काल से परे हैं, कल्याण स्वरूप हैं, और सज्जनों को आनंद देते हैं 🙏।
और आगे के श्लोक में कहते हैं:
न यावद् उमानाथपादारविन्दं (Na yavad umanatapadarvindam): जब तक लोग उमानाथ (शिव) के चरणकमलों का भजन नहीं करते
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् (Bhajantiha loke pare va naranam): तब तक उन्हें सुख, शांति, और संताप का नाश नहीं होता
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं (Prasida prabho sarvabhutadhivasam): हे प्रभो! मुझ पर प्रसन्न हों, जो सर्वभूतों में निवास करते हैं
और आगे कहते हैं:
न जानामि योगं जपं नैव पूजां (Na janami yogam japam naiva pujam): मैं योग, जप, और पूजा नहीं जानता
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् (Natoham sada sarvada shambhutubhyam): मैं सदा शंभु (शिव) को नमस्कार करता हूँ
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं (Jarajanmaduhkhougha tatapyamanam): जो जरा, जन्म, और दुःखों के समूह से पीड़ित है
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो (Prabho pahi apannamamish shambho): हे प्रभो! मुझे बचाओ, मैं शंभु (शिव) की शरण में हूँ 🙏।
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