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50 साल बाद पाक विस्थापितों को मिला अपना गांव छाछरो ! छाछरो का इतिहास इनकी जुबानी

Автор: VIRATRA NEWS NETWORK

Загружено: 2025-03-20

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पाक विस्थापित परिवारों को मिला अपना अलग से राजस्व गांव

1971 से पाक विस्थापित छाछरो का अब नए राजस्व बना

चौहटन ,
डूंगर राठी ,
1965 तथा 1971 में आए पाकविस्थापित जब पाकिस्तान छोड़कर भारत आए थे तब उनके कई घर तथा धन दौलत उन पुराने गांव में बॉर्डर के उस पार ही रह गए थे।
अब जब भी पाक विस्थापित अपना आज भी परिचय करवाते हैं तो भी अपने मूल गांव से अपनी पहचान दिलवाते हैं।
राजस्थान की सुबे की सरकार ने 2 महीने पहले पंचायती राज के पुनर्गठन के साथ-साथ नए राजस्व गांव बनाने की मूहिम चलाई है।
उसी के तहत इन पाक विस्थापित लोगों ने इस सुनहरे मौके को अपने हाथ से जाने नहीं दिया।
पाकिस्तान ए पाक विस्थापित अधिकतर लोग छाछरो, खीसर, अरबडियार, गडरा, डाहली, मिठी से आए थे।
इन गांवों में हिंदू परिवार अधिक रहते थे।
जिसमें राजपूत, मेघवाल, माहेश्वरी, सुथार, नाई, कुंभार, लोहार जाति बहुताज रहती थी।
इन इन पाकिस्तान के मन में आज भी अपने पुराने गांव की याद ताज रहती है।
1971 के युद्ध में जब भारतीय सेना पाकिस्तान के छाछरो गांव में पहुंची वहां पर छाछरो के निवासी भोजराज सोढा परिवार के मुखिया तथा वहां की कैबिनेट सरकार में रेल मंत्री लक्ष्मण सिंह सोढ़ा तथा उनके भाई पदम सिंह ने भारतीय सेना का सहयोग दिया।
तथा भारतीय सेना ने पाकिस्तान स्थित छाछरो स्थित अपनी हवेली पर भारतीय तिरंगा फहराया था।
19 75 युद्ध के पश्चात यह सारे परिवार अपना मूल गांव छाछरो छोड़कर 40 किमी दूर स्थित सीमा के इस पर बावड़ी कल में अपना आशियाना जमा लिया।
भोजराज सोठा परिवार ने राजनीतिक में यहां भी अपना वर्चस्व कायम करते हुए चौहटन पंचायत समिति का प्रधान के रूप में लक्ष्मण सिंह तथा बावड़ी कला में सरपंच में उनके भार्ता पदम सिंह ने जनता की सेवा की।
50 साल के अंतराल के पश्चात इन पाक छाछरो की तर्ज पर यहां पर भी अपने बावड़ी कला के राजस्व गांव में छाछरो राजस्व गांव बना लिया।
छाछरो नया गांव बनकर न केवल उनके परिवार को खुशी हुई बल्कि इनके साथ 1975 में आए सभी लोगों ने अपार खुशी जाहिरकर एक दूसरे के गले मिलकर मुबारक के साथ-साथ बधाइयां दी तथा अपने पुराने अस्तित्व को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए एक दूसरे पर हमेशा सहयोग देने की बातें कही।

50 साल बाद पाक विस्थापितों को मिला अपना गांव  छाछरो ! छाछरो का इतिहास इनकी जुबानी

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