कुपार लिंगो जी प्रकृति पूजक धर्म संस्कृति रीति रिवाज।
Автор: Kumhare music studio
Загружено: 2025-10-11
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कोयामुरी द्वीप में कोया वंशीय गण्डजीव का अति प्राचीन काल से ही इतिहास रहा है। जिसमें उनके पुर्वजों का कार्य सराहनीय रहा है। कोयावशीं गोंदला (समुदाय) को सही दिशा निर्देश देकर संचालित करने तथा मार्ग दर्शन करने के लिए गुरु की आवश्यकता होती थी। जो पुनेम के मार्ग पर चलने वाले समाज को दिशा और दिशा-निर्देश कर सकें। कोयामुरी द्वीप का 'शंभु शेक' पंच दीपों का स्वामी है, जो गण्डजीवों का राजा होता था। ऐसे 88 शंभु शेक अपने-अपने काल में कोयामुरीद्वीप में आधिपत्य किए गए और गण्डजीवों को संरक्षण कर सत्य मार्ग स्थापित किए गए। ऐसे मुठवा पोय, धर्म गुरू पहान्दी पारी कुपार लिंगों ने शंभु कार्यकाल के दौरान गोण्डवाना गण्डजीवों के गोंदला समुदाय को एक सुत्र में संचालित किया। ऐसे अनेक लिंगों हुए जो गोंडवाना को अपने-अपने कार्यकाल में समाज को दिशा प्रदान की। लेकिन, आधुनिक गोंड़वाना में लिंगो की कमी से पूरा गोंड़वाना समाज बिखरा हुआ है।
जब भी गोंड़वाना भू-भाग की बात होती है, तो हम देखते है कि गोंड़वाना भू-भाग का नामसर्व प्रथम आता है, जहां मानव सभ्यता की शुरुवात मानी जाती है। सबसे पहली विकसित सभ्यता कोई थी तो वह कोयतुरो(आदिवासियों) की ही व्यवस्था थी, जो आज आधुनिक भारत में छीन-भीन व्यवस्था में है। यह इसलिये है क्योंकि हमने समय के साथ बदलाव को स्वीकार नहीं किया और ऐसा नहीं है कि बदलाव नहीं हुवे है। गोंड़वाना भू-भाग में रहने वाले गण्ड जीवों जिसे "गोड़" कहा जाता है। यह समय के अनुसार आपने आपको बहुत बदले हैं। एक कहावत है कि हर 10 कोश में पानी बदल जाता है। उसी तर्ज पर गोंड़ लोगों की परिवेश व्यवस्था भी बदल जाती है। लेकिन इस कहावत को कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया गया कि आख़िर ऐसा क्यों हुआ ।
बहुत सारे इतिहासकारों ने और बुद्धजीवियों ने लिखा है कि, कोयतुरों की या गोंडों की पहिली सामाजिक व्यवस्था को रूप देने का कार्य किसी ने किया है तो वह 'प्रथम शंभु शेक कोसोडूम-शंभु मुला' की जोड़ी है। आगे चल कर इससे भी बड़ा महत्वपूर्ण कार्य 'शंभु ईसर-गवरा' के समय काल में 'पहांदी पारी कुपार लिंगो' ने एक समग्र रूप से इस पूरे गोंड़वाना भू-भाग के गण्ड जीवों को एक सूत्री में बांधते हुए, गोत्र एवं टोटामिक व्यवस्था सभी कोयतुरों (आदिवासी) को दिया। जिससे इस आदिवासी समाज की गोत्र एवं टोटामिक जीवन चक्र बनी रहे। जिसे अभी तक हम सभी जानते और मानते आ रहे हैं।
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