ज्ञान फकीरी छाई रे मैं हो गए मालामाल गायक शंकरजी हाथगी ऐसे भजन फिर नहीं मिलेंगे आपको 2025 न्यू सॉन्ग
Автор: mk music malpura Live
Загружено: 2025-10-16
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ज्ञान फकीरी छाई रे मैं हो गए मालामाल गायक शंकर जी हाथगी ऐसे भजन फिर नहीं मिलेंगे आपको 2025 न्यू सॉन्ग
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"ज्ञान फकीरी छाई रे मैं हो गए मालामाल"। यह पंक्ति बताती है कि जिसने सच्चा ज्ञान पा लिया, जिसने अपने भीतर के ईश्वर को पहचान लिया, वह बिना धन-दौलत के भी सबसे अमीर है। यह ‘मालामाल’ होना सांसारिक वैभव से नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष और आंतरिक शांति से है। गायक शंकर जी हाथगी इस भाव को इतने सरल शब्दों और सुरीले अंदाज में प्रस्तुत करते हैं कि हर श्रोता को लगता है मानो यह गीत उसी की आत्मा की आवाज़ है।
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भजन की शुरुआत में संगीत बेहद मधुर और शांत है, जो श्रोता को ध्यान की अवस्था में ले जाता है। धीरे-धीरे जब शब्द “ज्ञान फकीरी छाई रे” गूंजते हैं, तो मन भीतर तक झंकृत हो उठता है। यहाँ “फकीरी” का मतलब दर-दर की भीख नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ इंसान अपनी इच्छाओं, अहंकार और लोभ से मुक्त हो जाता है। फकीरी वह अमीर अवस्था है जिसमें इंसान कुछ मांगता नहीं, बल्कि जो कुछ है उसी में आनंदित रहता है। इस भाव को गायक ने इतनी सहजता से व्यक्त किया है कि यह सीधे आत्मा को छू लेता है।
भजन के बोलों में गहरी दार्शनिकता झलकती है — हर पंक्ति जैसे किसी संत की वाणी हो, जो जीवन का रहस्य खोलती जाती है। शंकर जी की आवाज़ में जो सादगी है, वह भजन के संदेश को और भी प्रभावशाली बना देती है। उनकी गायकी में कोई दिखावा नहीं, कोई कृत्रिमता नहीं — बस एक सच्चे साधक की प्रार्थना है, जो अपने प्रभु के चरणों में समर्पित है। संगीत में हारमोनियम, तबला और बांसुरी का सुंदर मेल है, जो भक्ति के वातावरण को और गहरा बना देता है।
यह भजन सुनते हुए लगता है जैसे किसी पुराने सूफी दरबार या संतों की सभा में बैठे हों, जहाँ सिर्फ प्रेम, सादगी और ईश्वर की याद गूंजती हो। “ज्ञान फकीरी छाई रे” का मतलब है कि जब ज्ञान की रोशनी मन पर छा जाती है, तो फिर कोई अभाव नहीं रह जाता। मनुष्य उस क्षण में स्वयं को सम्पूर्ण महसूस करता है। वह समझ जाता है कि सच्चा सुख धन-संपत्ति, शोहरत या शक्ति में नहीं, बल्कि अपने भीतर की शांति में है। यही भजन का मुख्य संदेश है — जो अपने भीतर झांकता है, वही सच्चा अमीर है।
2025 में यह भजन आने के बाद से ही भक्त समुदाय में इसकी चर्चा तेजी से फैल रही है। कई लोग इसे ध्यान और साधना के समय सुनते हैं, क्योंकि इसकी लय और भाव मन को एकाग्र करने में सहायक हैं। सोशल मीडिया और भजन मंचों पर भी शंकर जी हाथगी की यह रचना अपनी सादगी और आध्यात्मिक गहराई के कारण विशेष रूप से सराही जा रही है। यह भजन एक नई पीढ़ी को यह समझाने का प्रयास करता है कि आधुनिक जीवन की दौड़ में असली खुशी बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर है।
भजन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है फकीरी का गौरव। आज के समय में “फकीर” शब्द को अक्सर गरीबी या अभाव से जोड़ा जाता है, लेकिन इस भजन में शंकर जी दिखाते हैं कि फकीरी दरअसल समृद्धि का दूसरा नाम है। फकीर वह है जो सब कुछ त्यागकर भी सबसे अमीर है, क्योंकि उसने परमात्मा को पा लिया है। इस विचार को उन्होंने बड़ी सहज भाषा में गाया है — कोई कठिन दर्शन नहीं, कोई जटिल शब्द नहीं, बस अनुभव से निकले सच्चे शब्द हैं।
भजन में छिपा संदेश यह भी है कि जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़ देता है, तो ज्ञान अपने आप प्रकट होता है। यह ज्ञान किताबों से नहीं, बल्कि आत्मबोध से आता है। इसीलिए भजन की हर पंक्ति में आत्मज्ञान की महिमा झलकती है। “ज्ञान फकीरी छाई रे” सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का मंत्र है — जो इसे अपनाता है, वह जीवनभर के लिए ‘मालामाल’ हो जाता है।
शंकर जी हाथगी का गायन शैली पारंपरिक लोक भक्ति से जुड़ी हुई है, लेकिन उन्होंने इसमें आधुनिक संगीत की झलक भी दी है, जिससे यह गीत हर पीढ़ी के लोगों को जोड़ता है। बुजुर्गों को इसमें संतों की वाणी की झलक मिलती है, तो युवाओं को इसमें आत्मिक प्रेरणा का स्रोत दिखाई देता है। यही वजह है कि यह भजन भक्ति संगीत की नई दिशा का प्रतीक बन गया है — जिसमें परंपरा भी है और आधुनिकता भी।
भजन के मध्य भाग में जब स्वर ऊँचे होते हैं और तबले की ताल तेज़ होती है, तब ऐसा लगता है जैसे कोई साधक समाधि में प्रवेश कर गया हो। उस क्षण श्रोता का मन भी गीत के साथ बहने लगता है — मानो वह भी कह रहा हो, “अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैंने ज्ञान पा लिया, मैं मालामाल हूँ।” यह अनुभव शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता — यह सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
गीत का समापन बड़ी सुंदरता से किया गया है। आखिरी पंक्तियों में शंकर जी गाते हैं कि “जिसने ज्ञान पाया, उसने ईश्वर को पाया।” यह निष्कर्ष पूरे भजन का सार है — कि जीवन का लक्ष्य बाहर नहीं, भीतर है। जो स्वयं को जान लेता है, वही परमात्मा को जानता है। यही सच्ची फकीरी है, यही सच्चा धन है, यही अमीरी है।
कुल मिलाकर, "ज्ञान फकीरी छाई रे मैं हो गए मालामाल" एक ऐसा भजन है जो केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा आनंद भोगों में नहीं, त्याग में है; सच्ची अमीरी पैसों में नहीं, ज्ञान में है; और सच्चा जीवन तब शुरू होता है जब हम अपने भीतर के फकीर को पहचान लेते हैं। शंकर जी हाथगी ने इस रचना के माध्यम से भक्ति संगीत को एक नया आयाम दिया है, जहाँ भजन सिर्फ स्वर और शब्द नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है
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