नागपंचमी की कुश्ती और बदले की आग: मुंशी प्रेमचंद की 'अंधेर' | ग्रामीण जीवन की कहानी
Автор: Kahani Suno
Загружено: 2025-06-08
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क्या होता है जब जीत का जश्न बदले की आग में बदल जाए? और न्याय की गुहार भी 'अंधेर' का शिकार हो जाए?
प्रस्तुत है महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की एक और कालजयी और यथार्थवादी कहानी - 'अंधेर' (Andher)। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के उस कठोर सत्य का दर्पण है जहाँ सांप्रदायिक होड़, पुलिस की मनमानी, और न्याय-व्यवस्था की विडंबनाएँ आज भी एक आम इंसान की ज़िंदगी को प्रभावित करती हैं।
कहानी साठे और पाठे गाँवों के बीच नागपंचमी की कुश्ती से शुरू होती है, जहाँ साठे का पहलवान गोपाल विजयी होता है। लेकिन इस जीत का बदला पाठे के लोग अँधेरी रात में गोपाल पर हमला करके लेते हैं। इसके बाद जो होता है, वह पुलिस, मुखियों और तथाकथित न्याय के नाम पर होने वाले 'अंधेर' को उजागर करता है। क्या चोट खाया हुआ गोपाल न्याय पा पाएगा? या उसे अपने ही गाँव के प्रतिष्ठित लोगों द्वारा किए गए 'अंधेर' को सहना होगा? 🤔
यह कहानी आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि एक गरीब, ईमानदार व्यक्ति के लिए समाज में अपनी सच्चाई साबित करना कितना मुश्किल हो सकता है। प्रेमचंद जी ने बहुत सलीके से ग्रामीण जीवन की सामाजिक-आर्थिक परतों, पुलिस की क्रूरता, और जातिगत भेदभाव को बुना है।
👇 कहानी सुनकर आपको कैसा लगा? क्या आज भी हमारे समाज में 'अंधेर' कायम है? अपने विचार और अनुभव कमेंट्स में ज़रूर साझा करें!
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