तोशाम पहाड़ी जहा पांडवों ने की थी शिव जी की पूजा - Mungipa Dham Tosham ~ Part - 2 || Sunita Goyal ||
Автор: Sunita Goyal
Загружено: 2021-11-04
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तोशाम पहाड़ी जहा पांडवों ने की थी शिव जी की पूजा - Mungipa Dham Tosham ~ Part - 2 || Sunita Goyal || #sunitagoyal #shivling #tosham
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बाबा मुंगीपा महाराज के बारे में संपूर्ण जानकारी
श्री बाबा मंगीपा महाराज धाम तोशाम हरियाणा राज्य के भिवानी जिले में ब्लॉक तोशाम मैं बनी पहाड़ी के ऊपर स्थित है तोशाम ब्लॉक के लगभग 100 गांव में मुंगीपा बाबा की मान्यता हर घर में है
एक कथा के अनुसार श्री मुंगीपा महाराज श्री योगी गोपीचंद की बहन है तथा सिद्ध योगी भरतरी की भांजी है उनके संन्यास लेने के संबंध में यह कहा जाता है कि श्री योगी गोपीचंद की माता मैनावती ने अपने पुत्र के सौंदर्य को देखकर मन में विचार किया कि यह सुंदर शरीर भी एक दिन काल का ग्रास बन जाएगा क्योंकि मैनावती के पति राजा पदम सेन की अकाल मृत्यु हो गई थी इस बात को ध्यान में रखते हुए मैनावती ने मन ही मन प्रण किया कि वह अपने पुत्र को अमर कर देगी चाहे उसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े इस संबंध में वह अपने भाई सिद्ध योगी भरतरी से मिलने गई और अपने मन की व्यथा उनके सामने प्रकट की श्री योगी भरथरी जी ने अपनी बहन को पहले तो यह कहा कि शरीर नश्वर है तथा जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है लेकिन बहन की जिद के आगे भाई को झुकना पड़ा भरथरी ने अपनी बहन को बताया कि मृत्यु से विजय प्राप्त करने का एक ही उपाय है कि उसे भक्ति मार्ग अपनाना होगा और कठोर तपस्या करनी होगी लेकिन यह सब कार्य करने के लिए उसे गृहस्थाश्रम छोड़ना होगा भाई की यह बात सुनकर मैनावती सोच विचार में पड़ गई और अपने पुत्र को अमरत्व प्रदान करने के लिए उसने पुत्र मोह त्याग दिया। भरथरी ने अपने भांजे गोपीचंद को पहले संन्यास की दीक्षा दी और उसके पश्चात कठोर साधना एवं तपस्या करवाई जब सिद्ध योगी भरथरी को गोपीचंद पर पूर्ण विश्वास हो गया तो उन्होंने अपने गुरु गोरखनाथ जी से अमृत्व वरदान दिलवाया। गुरु शिष्य के इतिहास में यह पहली घटना थी जब किसी गुरु ने अपने शिष्य को अमरत्व वरदान दिलवाया हो महान योगी भरथरी ने गोपीचंद से एक वचन मांगा और कहा कि उसे अपनी माता पत्नी और बहन से भिक्षा प्राप्त करनी होगी तथा यह भी कहा कि अपनी पत्नी से भिक्षा मांगते समय उसे माता कहकर संबोधित करना होगा तथा संसार के सभी रिश्ते नातों से नाता तोड़कर बंधन मुक्त होना होगा गोपीचंद ने गुरु की आज्ञा का पालन किया सबसे पहले अपनी पत्नी से भिक्षा लेकर आया उसके पश्चात गोपीचंद अपनी बहन चंद्रावल से भिक्षा लेने गया चंद्रावल महल के बाहर गोपीचंद ने अलख जगाई तो एक दासी भिक्षा लेकर उसके पास आई गोपीचंद ने दासी के हाथ से भिक्षा लेने से इंकार कर दिया और कहा कि वह अपनी बहन के हाथ से ही दीक्षा लेगा यह बात सुनकर दासी हंसने लगी और कहने लगी हमारी महारानी के भाई गोपीचंद तो बहुत बड़े राजा हैं कोई साधु सन्यासी नहीं आप यहां से चले जाइए यह सुनकर गोपीचंद वहां से चल पड़े इस बारे में जब रानी चंद्रावल को जानकारी हुई तो वह दौड़ी-दौड़ी महल के बाहर आई तो उसने देखा फिर वहां से गोपीचंद जा चुके थे रानी चंद्रावल महल के ऊपर जाकर के दूर-दूर तक नजर घुमा कर देखती है उसे दूर उसका भाई साधु के वेश में जाता हुआ नजर आता है अपने भाई को जोगी के भेष में देखकर उसे बहुत पीड़ा हुई और उसने भाई के विरह में महल से छलांग लगा दी और उसकी मृत्यु हो गई जैसे ही गोपीचंद को बहन की मृत्यु के बारे में समाचार प्राप्त हुआ तो वह बहुत दुखी हुआ उसने महसूस किया कि उसके कारण उसकी बहन की मृत्यु हो गई गोपीचंद अपने गुरु गोरखनाथ जी के पास जाकर चरणों में गिरकर रोने लगे और उन्होंने अपने गुरु जी से कहा कि मुझसे घोर पाप हुआ है मेरे कारण मेरी बहना भी संसार में नहीं रही इस कलंक के बोझ के साथ में जीवित नहीं रह सकता और अमरत्व प्राप्त करने के कारण अब मैं मर भी नहीं सकता उसने गुरु गोरखनाथ जी से हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वह चंद्रावल को जीवित करदे
श्री गोरखनाथ जी ने गोपीचंद से कहा कि जब मृत्यु हो जाती है उसे पुनर्जीवित करना प्रकृति के विधान के विरुद्ध है लेकिन तुम मेरे प्रिय शिष्य हो इसलिए मैं तुम्हारी बहन को एक शर्त के साथ जिंदा करूंगा कि अगर तुम्हारी बहन पुनर्जीवित होगी तो उसे सन्यास धारण करना होगा गोपीचंद ने शर्त को स्वीकार किया गुरु गोरखनाथ जी ने चंद्रावल को जीवित कर दिया और उसी क्षण श्री गोरखनाथ जी ने चंद्रावल को संन्यास की दीक्षा दी और दोनों भाई बहन गोपीचंद चंद्रावल नाथ संप्रदाय के महान संत हुए । चंद्रावल ने भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में रहकर तपस्या की और अनेक सिद्धियां प्राप्त की उसके पश्चात चंद्रावल का नाम भारत के 84 सिद्धो में अंकित हुआ। 11 वीं सदी के आसपास चंद्रावल नाथ का तोशाम क्षेत्र में आये और इस क्षेत्र में चंद्रावल सिद्ध मुंगीपा महाराज के नाम से विख्यात हुए। बताया जाता है कि यहां पहाड़ी के ऊपर प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन के नजदीक दो आलौकिक तेज वाले साधुओ को देखा जाता है और वह साधु और कोई नहीं सिद्ध योगी गोपीचंद सिद्ध योगी भरथरी जी बताए जाते हैं जो बाबा मुंगीपा महाराज के भाई व मामा है
यहां पहाड़ी के ऊपर 5000 साल पुराना शिवलिंग भी मौजूद है जहां पर पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान शिव जी महाराज की साधना की थी इसके अलावा यहां पहाड़ी पर अनेक देवी देवताओं के मंदिर बने हुए हैं तोशाम की पहाड़ी पर दूर दूर से श्रद्धालू दर्शन करने आते है
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