निठल्ले की डायरी
Автор: CinemaScope
Загружено: 2025-11-20
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निठल्ले तीन प्रकार के होते हैं-पैदाइशी, शौकिया और प्रोफेशनल। पैदाइशी निठल्ले इस दुनिया में अपने नितांत मौलिक रूप में अवतरित होते हैं और इनकी महिमा का बखान दास मलूका अपनी अमर रचना में कर चुके हैं। शौकिया निठल्ले ज्यादातर सरकारी महकमों में पाये जाते हैं। इनके पास करने को बहुत से काम होते हैं पर चूंकि ये शौकीन तबीयत इंसान होते हैं, इसलिए कुछ न करने का शौक फरमाते हैं। कहते हैं कि एक इंसान को नींद न आने की बीमारी थी। उसे सरकारी विभाग में रात की पाली में चौकीदार की नौकरी मिली तो बीमारी ठीक हो गयी। प्रोफेशनल निठल्ले खुद तो कुर्सी पर जमे रहते हैं पर बैठे-ठाले सारी दुनिया को चकरघिन्नी की तरह घुमाने की सलाहियत रखते हैं। ये ज्यादातर सियासी हलकों में पाये जाते हैं और अपने फन से करोड़ों के वारे-न्यारे करते हैं। यों निठल्लेपन का दर्शन अपने आप में अत्यंत उच्च, प्राचीन और महान है जो मानव-मात्र को मोह-माया के बंधन से दूर रखता है।
लेकिन यहाँ जिस निठल्ले की बात आपसे करनी है वो नाम से ठीक उलट बेहद सक्रिय है। हकीकतन मैंने इस शख्स को कभी खाली बैठे हुए देखा ही नहीं। बोलते-बतियाते भी कम देखा है या मुझसे ही ज्यादा गुफ़्तगू नहीं है। वह उस दुर्लभ प्रजाति का इंसान है जिसे थियेटर एक्टिविस्ट कहा जाता है और जो आज के जमाने में भी इस जालिम हिंदी पट्टी में थियेटर के बूते जिंदा है। आप इस अजूबे से थियेटर सम्बन्धी कोई भी काम करवा सकते हैं और इसलिए वह हर समय किसी न किसी काम में व्यस्त होता है। कामकाज में अत्यंत व्यस्त इस निठल्ले का नाम संतोष राजपूत है और वह अपने गुरु अरुण पाण्डेय का पक्का चेला है।।थियेटर एक्टिविज्म की तालीम गुरुजी से गंडा बांधकर हासिल की है और जरूरत पड़ने पर वह दुश्मन की भी मदद कर सकता है, बस काम नाटक -नौटंकी वाला होना चाहिए। आप इस अद्भुत निठल्ले से निर्देशन करवा सकते हैं, अभिनय करवा सकते हैं, ध्वनि-प्रकाश का काम सौंप सकते हैं, ब्रोशर बनवा सकते हैं, अनुदान के लिए प्रस्ताव का खाका तैयार करवा सकते हैं, सेट और प्रॉपर्टी की जिम्मेदारी सौंप सकते हैं, बाहर से आ रही किसी टीम को अगवानी के लिए भेज सकते हैं। ताल वाद्यों में संतोष के हाथ सधे हुए हैं और वे कई नाटकों में संगीतकार सुयोग पाठक के साथ संगत कर चुके हैं। गरज यह कि मंच के पीछे, मंच से आगे, मंच पर; थियेटर का ऐसा कोई काम नहीं है जो यह शख्स न कर सकता हो। इसी हरफनमौला काबिलियत की वजह से शहर के शायर सूरज राय 'सूरज' उन्हें थियेटर की दुनिया का 12 नम्बर का पाना कहते हैं जो बड़े काम का होता है और कहीं भी फिट हो जाता है।
शांत और चुपचाप, धीर-गम्भीर, जरूरत पड़ने पर सिर्फ एक हल्की सी मुस्कुराहट बिखेर देने वाले संतोष मुझे नाटकों के प्रतिष्ठित और बड़े आयोजनों से लेकर यूनिवर्सिटी, कॉलेज या रेलवे की नाट्य प्रतियोगिताओं में भी नज़र आ जाते हैं। अक्सर लाइट या साउंड में। कभी-कभी मंच पर कुछ उठापटक करते हुए। प्रतियोगी दलों को वे अपनी व्यावसायिक सेवाएँ प्रदान करते हैं। जरिया-ए-माश का एक हिस्सा यह भी है। काम जरा मुश्किल है पर लगता है कि चल जाता है। मैंने कभी पूछा नहीं। संतोष ने भी बताया नहीं। हमारे बीच संवाद अक्सर मौन की भाषा में होते हैं। कभी आंखों से, कभी हाथ हिलाकर और कभी एक हल्की-सी मुस्कान के साथ। एक सम्मानजनक दूरी शुरू से ही बनी हुई है और सच कहूँ तो बरसों से मिलते-जुलते रहने के बाद हमने एक गुप्त समझौते के तहत इस तिलिस्म को तोड़ा नहीं है। कभी बहुत ज्यादा जरूरी हुआ तो बस एक-दो वाक्यांशों से काम निकाल लेते हैं।
परसाई जी की रचनाओं पर आधारित अरुण पाण्डेय के सबसे चर्चित और मकबूल नाटक 'निठल्ले की डायरी' में संतोष को निठल्ले की भूमिका नरोत्तम बेन उर्फ नानू के मुम्बई चले जाने के बाद हासिल हुई। 'निठल्ले की डायरी' नाटक की स्क्रिप्ट अरुण पांडेय ने रायपुर में ही तैयार की जब वे 'दैनिक भास्कर' में थे। अखबार में और कुछ हो या न हो न्यूज प्रिंट इफरात मात्रा में उपलब्ध रहता है। पाण्डेय जी ने इन्हीं कोरे कागजों में गोदा-गादी शुरू की और जो पहला ड्राफ्ट तैयार हुआ; उस पर यदि नाटक खेला जाता तो वह महज 8 घण्टों का होता। काट-छांट बाद में शुरू हुई और वह भी पाण्डेय जी ऐसी पीड़ा के साथ करते रहे, जैसे शरीर के किसी अंग की सर्जरी की जा रही हो। बहरहाल, एक लंबे आलेख का दीर्घकालिक फायदा यह हुआ कि नाटक अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दृश्यों-प्रसंगों पर खेला जा सकता है। खेला भी जा रहा है और लंबे समय से निठल्ले के किरदार में संतोष मौजूद हैं। निठल्ले के पास एक साइकिल भी है पर आज तक उसे प्रमोशन नहीं मिल सका है, अन्यथा वह कभी तो स्कूटी चलाता हुआ नजर आता।
निठल्ले के संगी-साथी, दोस्त, हमनफस, हमनवा कक्काजी हैं। कक्काजी उर्फ नवीन चौबे पहले ही शो से क्रीज पर जमे हुए हैं अब तक नॉट-आउट खेल रहे हैं। निठल्ले और कक्काजी की जुगलबंदी गज़ब की है। नाटक से बाहर भी। जबलपुर के मालवीय चौक में नियमित रूप से होली के दिन एकत्र होते हैं और रंग-गुलाल से पहले रसरंजन की परंपरा को आगे बढाते हैं। कहते हैं कि होली के इस पावन अवसर पर कक्काजी की छत्रछाया में वे कई होनहार युवकों का 'अन्न प्रासन' कर चुके हैं और उम्मीद की जाती है कि आगे भी करते रहेंगे।
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