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नन्दबाबा की विदाई के उपरांत श्री कृष्ण और बलराम चले महर्षि सान्दीपनि के आश्रम | श्री कृष्ण जीवनी

Автор: Tilak

Загружено: 2025-11-16

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जहाँ मथुरा नगरी में चारों ओर उल्लास और हर्ष का वातावरण था, वही दूसरी ओर महल के एक शांत कक्ष में श्रीकृष्ण और बलराम मौन बैठे थे। श्रीकृष्ण को गंभीर और चिंतित देख बलराम उनसे पूछते है कि क्या बात है कृष्ण। श्रीकृष्ण ने धीरे से कहते है बड़ी मुश्किल की घड़ी आ रही है भैया, नन्दबाबा के विदाई की घड़ी। लेकिन उनको विदा करना इतना सहज नहीं है। कही वे आज्ञा देकर हमें गोकुल वापस न ले जाए, जिससे हम जिस कार्य के लिए धरती पर आए है उसका क्या होगा। बलराम कहते है कि हम उनकी आज्ञा नहीं मानेंगे। श्री कृष्ण कहते है कि पिता श्री का आज्ञा न मानना महापाप है। इसी दुविधा में पड़े श्री कृष्ण महामाया का स्मरण करते है, जिससे वह प्रकट होती है। श्री कृष्ण उनसे अनुरोध करते है कि वह नन्दबाबा के हृदय से मोह और ममता का भार कुछ कम कर दे, जिससे उनके मन में ज्ञान का प्रकाश फैल सके और उन्हें शांति मिल सके। महामाया आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो जाती है। तभी नन्दबाबा को अपनी ओर आता देख श्रीकृष्ण और बलराम उनके चरण स्पर्श करते है। नन्दबाबा दोनों को गले लगा कर फूट-फूट कर रो लगते हैं और कहते है कि पराये पुत्र से इतना मोह रखने पर मुझे लज्जा आती है। यह सुन श्री कृष्ण का हृदय विचलित हो जाता है और वह बाबा का हाथ पकड़कर कहते है कि कौन कहता है कि तुम मेरे पिता नहीं हो? केवल यशोदा मैया को माता और आपको पिता समझते हुए हम बड़े हुए है बाबा। नन्दबाबा को बिलखता हुआ देख श्री कृष्ण ने नन्दबाबा को धीरे से आसन पर बैठाते है और कहते है कि जब पुत्र बड़ा हो जाता है, तब उसके माता-पिता उसे अपने काम करने के लिए, व्यापार करने के लिए, देश सेवा के लिए और कभी मानव सेवा के लिए दूर भेजते है। और हमें बहुत से कर्तव्यों को पूरा करना है, मैया-बाबा के लाड़-प्यार की छाया से निकल कर एक लंबे कठोर कर्तव्य पथ पर चल पड़ा हूँ, इसलिए मेरा रास्ता न रोको। इस संसार में सभी रिश्ते क्षणिक हैं। सत्य केवल एक है – नारायण, बाकी सब माया का जाल है। इसी कारण भगवान का एक नाम सत्यनारायण भी है बाबा। नन्दबाबा ने गहरी साँस लेते हुए पूछते है कि सच बताओ क्या तुम भगवान हो। कृष्ण ने शांत स्वर में कहते है कि हाँ मैं भगवान हूँ, क्योंकि शास्त्र कहता है कि हर जीव में भगवान का अंश विद्यमान होता है। यदि माया के चक्षुओं की जगह ज्ञान और भक्ति की दृष्टि से देखोगे तो पत्थर भी भगवान दिखाई देगा। आवरण से मुक्त होना आवश्यक है। जिसने अपने भीतर का अंधकार मिटा लिया, वही साक्षात् भगवान का दर्शन कर सकता है। श्री कृष्ण के वचनों से नन्दबाबा का हृदय को शांति मिलती है और वह आँसू पोंछते हुए कहते है कि मैं प्रार्थना करूँगा कि तुम्हारा कर्तव्य-पथ ही तुम्हारा कीर्ति-पथ बने। नन्दबाबा गोकुलवासियों के साथ बैलगाड़ियाँ में बैठकर मथुरा से प्रस्थान कर जाते हैं। नन्दबाबा के विदा होते ही वसुदेव अपने दोनों पुत्रों को लेकर ऋषि गर्ग के आश्रम पहुँचते है। वहाँ ऋषि गर्ग ने आनंदपूर्वक उनका स्वागत करने के उपरांत दोनों भाइयों का यज्ञोपवीत संस्कार कराते है, ब्रह्मचर्य की शिक्षा प्रदान करते है और आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए महर्षि सान्दीपनि के पास जाने का निर्देश देते है।। श्रीकृष्ण और बलराम वटुकों के वेश में, नंगे पाँव, विनम्र भाव से अवन्तिका की ओर प्रस्थान करते हैं। उनकी आँखों में तेज, वाणी में शांति और कदमों में उद्देश्य था।


सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे ""श्रीमद्भगवद्गीता"" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल ""तिलक"" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण ""श्री कृष्ण जीवनी"" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए।

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