गुरु-शिष्य दोनों संग पंक्ति में— शरण अजगन्न तांदे
Автор: Speaks of Shiva ಶಿವನುಡಿ शिवस्वर சிவஸ்வரம் శివస్వరం
Загружено: 2026-01-24
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गुरु-शिष्य दोनों संग पंक्ति में
लिंगार्चन किया है—ऐसा कहना?
हाय! हाय! यह बाल-वाणी
सुनने योग्य नहीं है, कहना!
नहीं-नहीं, यह संभव है—
क्या कारण? सुनो, क्या आधार:
जहाँ गुरु-ज्ञान की अविरल धारा
पहचानी जाए—वहीं स्वीकार।
हो सकता है, हो सकता है।
यदि शिष्य के मन से प्रसाद को लेकर
भय और शंका पीछे हट जाएँ,
हो सकता है, हो सकता है।
पर इसके सिवा—लिंग-प्रसाद से ऊपर
गुरु-प्रसाद रखा मैंने—
कहें मुझे शिव-द्रोही!
कहें कि गुरु-द्रोह किया मैंने!
इसी कारण, हे महाघन सोमेश्वर,
यदि तुममें इन्हें गुरु-शिष्य कहा जाए,
तो मुझको यहाँ से उठा ले जाओ—
मैं नहीं रहूँ, तुम ही रह जाओ।
— *शरण अजगन्न तांदे*
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