POWERFUL - बिना धुआँ, बिना आग - मंत्र की ज्योतिसे जलता है पापों का अंधेरा, शिव गायत्री - शुद्धि
Автор: साधना !!!
Загружено: 2026-01-15
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शिव गायत्री मंत्र सर्वाधिक शक्तिशाली एवं आध्यात्मिक रूप से गहन मंत्रों में से एक है। यह मंत्र श्री रुद्र या भगवान शिव के तत्पुरुष रूप को समर्पित है और गायत्री छंद में रचित है, जो वैदिक साहित्य का सर्वोच्च छंद माना जाता है। इस मंत्र का उद्गार सृष्टि के उस अद्वितीय तत्व की ओर संकेत करता है जो जीवात्मा और परमात्मा के बीच का सेतु है। "तत्पुरुष" शब्द का अर्थ है — "वह पुरुष जो सब कुछ है", अर्थात् वह सर्वव्यापी चैतन्य जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करता है और फिर भी सम्पूर्ण ब्रह्मांड का नियंत्रण करता है। इस मंत्र का प्रत्येक शब्द गहन दार्शनिक एवं तांत्रिक अर्थ वहन करता है और इसका जाप केवल ध्वनि उच्चारण नहीं, बल्कि आत्मा के साथ सीधा संवाद है।
मंत्र का पाठ इस प्रकार है: “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥”
इसका आशय है — “हम तत्पुरुष (शिव के उस रूप) का ध्यान करते हैं जो समस्त विश्व के आधारभूत चैतन्य के रूप में विद्यमान हैं। हम महादेव को धारण करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वे हमारी बुद्धि को प्रबुद्ध करें, अज्ञान के अंधकार से मुक्त करके सत्य के मार्ग पर प्रेरित करें।” यह मंत्र ज्ञान (विद्या) का प्रतीक है और इसे नियमित रूप से जपने से जीवन में स्पष्टता, आत्म-विश्वास तथा आध्यात्मिक दृष्टि का विकास होता है। विशेष रूप से, यह मंत्र मन के विक्षेप, आतंक, क्रोध और लोभ जैसे विकारों को शांत करने में सक्षम है।
शास्त्रों के अनुसार, शिव गायत्री मंत्र का नियमित जाप व्यक्ति के अंतर्मन को शुद्ध करता है और उसे शिव के साक्षात्कार की ओर ले जाता है। यह मंत्र पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से परे आत्मतत्व की ओर संकेत करता है और अहंकार के बंधन को ढीला करता है। जप के समय यदि एकाग्रता के साथ ध्यान किया जाए, तो यह मंत्र तीसरे चक्र (मणिपूर) और छठे चक्र (आज्ञा चक्र) को सक्रिय करता है, जिससे अंतर्ज्ञान (intuition) और आत्म-नियंत्रण में वृद्धि होती है। यह मंत्र विशेष रूप से उन साधकों के लिए लाभदायक है जो ज्ञान मार्ग (ज्ञान योग) अपनाते हैं, क्योंकि यह बुद्धि को तीक्ष्ण एवं पवित्र बनाता है।
इस मंत्र की शक्ति केवल उच्चारण में नहीं, बल्कि भावना, श्रद्धा और नियमितता में छिपी है। प्रातःकाल के ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4:00 से 6:00 बजे) या संध्या के समय इसका जाप सर्वाधिक फलदायी माना गया है। आदर्श रूप से, इसे रुद्राक्ष की माला द्वारा 108 बार जपना चाहिए। जो व्यक्ति इस मंत्र का नियमित अभ्यास करता है, उसके जीवन से भय, चिंता और भ्रम क्रमशः विलीन हो जाते हैं, और उसके हृदय में शिव की कृपा का अमृत वर्षित होता है। अंततः, यह मंत्र केवल सुख-शांति का साधन नहीं, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति का एक सुनिश्चित मार्ग है।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
हर हर महादेव! 🙏
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