देवियांण ।। महाकवि श्री ईसरदास जी कृत ।। प्रपाठ : डॉ. गजादान सा चारण 'शक्तिसुत' नाथूसर
Автор: Sri Karni Yuva Sangh
Загружено: 2020-06-13
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कवि श्री ईसरदासकृत ‘देवियांण’ का परिचय –
शक्तितत्त्व के अनुसंधानकर्ता जिज्ञासुओं तथा साधकों के लिए ’देवियांण’ अनुपम स्तोत्ररत्न है। भावुक भक्त की भक्ति एवं प्रपत्ति की अभिव्यंजना के साथ-साथ ज्ञानात्मक सूक्ष्मविचार व तत्त्वनिरूपण से युक्त स्तोत्रों में यह महत्त्वपूर्ण है। यह एकशक्तिवाद या एकतत्त्ववाद का प्रतिपादक स्तोत्रकाव्य है। इसके सिद्धान्तानुसार एकमात्र शक्तितत्त्व के अतिरिक्त कोई सत्ता नहीं है। जैसे अनेक स्वर्णाभूषण वस्तुतः स्वर्ण के ही आकृतिभेद हैं उसी प्रकार देवी, देवता, प्राणी, पर्वत, नदी, नाले सब शक्ति के ही विविध व्यक्त रूप हैं। उस शक्तितत्त्व की वास्तविकता को समझना मानवी बुद्धि के वश की बात नहीं है। देवीमहिमा के वर्णन में अपनी सारी प्रतिभा उड़ेलकर भी भक्तकवि अन्त में समर्पणभाव से कहता है –
देवी बापड़ा मानवी कांइ बूझे।
देवी तोहरा पार तूं हीज सूझे।।
देवी तूंज जांणै गति ग्हैन तोरी।
देवी तत्तरूपं गति तूंज मोरी।।
देवियांण राजस्थानी भाषा की लोकप्रिय रचना है। इसके रचयिता महात्मा ईसरदास भक्तिसाहित्य के कीर्तिस्तम्भ माने जाते हैं। महात्मा ईसरदास की मातृभूमि मरुधरा का भारत के ही नहीं अपितु विश्व के सांस्कृतिक इतिहास में अत्यन्त महत्त्व है। देश-विदेश के विद्वानों और वैज्ञानिकों ने मरुधरा को जीवसृष्टि का आदिकेन्द्र माना है। भूगर्भविज्ञान तथा पुरातत्त्वविज्ञान के अनुसार पृथ्वी पहले जलमग्न थी। उसकी सतह से क्रमशः जल हटा और उस जलमुक्त स्थान (मरुधरा) पर पहले-पहल मानव-सभ्यता का उद्भव हुआ। भारतीय संस्कृति की भी यही मान्यता है। पद्मपुराण के अनुसार सबसे पहले पुष्कर क्षेत्र का भूभाग जल से बाहर निकला –
उद्धृता पुष्करे पृथ्वी सागराम्बुगता पुरा।
पहले चरण में जलमुक्त पृथ्वी (मरुधरा) का विस्तार कुरुक्षेत्र तक हो गया। मरुधरा का वैदिक शर्यणावत् (अरावली) पर्वत विश्व का प्राचीनतम पर्वत माना गया है। उसकी घाटियों और गुफाओं में मानव-सभ्यता के आदि युग के अवशेष प्राप्त होते है। सरस्वती नदी से सिंचित होने के कारण उस भू-भाग को सारस्वत क्षेत्र कहा गया। सरस्वती नदी के तटों पर मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने वेदमन्त्रों का साक्षात्कार किया। सारस्वत क्षेत्र की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मानी गई है। उसकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता मातृपूजा है। सभ्यताकेन्द्रों से खुदाई में अनेक मृण्मयी मातृमूर्तियाँ मिली हैं जो वैदिक देवीतत्त्व-सिद्धान्त के अनुरूप हैं।
वैदिक ऋषियों ने देवी को माँ मानकर अम्बे! अम्बिके!! आदि संज्ञाओं से अभिहित किया है। देवी ने सृष्टि-प्रक्रिया के संचालन के लिए तीन रूप धारण किए जिन्हें महाकाली महालक्ष्मी और महासरस्वती कहा गया। एक वैदिक ऋषि ने सरस्वती नदी से सिंचित सारस्वत क्षेत्र में पूजित तीन देवीरूपों का बड़े भावभरे शब्दों में वर्णन किया है-
सरस्वती सारस्वतेरभिवाक्
तिस्त्रो देवीर्वहिरेदं सदस्तु (ऋग्वेद 3,4,8)
वेदोत्तर साहित्य में वैदिक देवीसिद्धान्त ही विविध शैलियों में व्यक्त हुआ है। देवियांण स्तोत्र में देवीविषयक सिद्धान्त का सारभूत तत्त्व अति संक्षेप में व्यक्त हुआ है।
देवियांण में कुल 92 छन्द हैं। इसमें देवी के निराकार और साकार दोनों रूपों का वर्णन है। निराकार शक्ति रूप में वह सृष्टि की ‘करता हरता’ है। वह भक्तों के कल्याण के लिए साकार विग्रहरूप में हिंगलाज, आशापूर्णा, चामुण्डा, अम्बा, काली, भद्रकाली, दधिमथी, कैला, बीजासणी, जोगणी, जयन्ती, जमवाय, लक्ष्मी, कात्यायनी, शाकम्भरी, सच्चिया आदि नामों से स्थान-स्थान पर विराजमान है। भक्त अपने कुल की रक्षिका कुलदेवी के रूप में माता के इन रूपों को पूजते हैं।
देवियांण में नारी-गौरव की भारतीय परम्परा व्यक्त हुई है। जैसे दुर्गासप्तशती में ‘तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः’ कहकर स्त्रियों को देवी रूप बताया गया है, उसी तरह देवियांण में देवी के विविध नारीरूपों का गौरवपूर्ण वर्णन किया गया है। देवी श्रद्धामयी नारी के रूप में पुरुष में आस्थातत्त्व का संचार करके उसे तार देती है –
‘देवी नारी रे रूप पुरसां धुतारी’
कवि देवी को कन्या कहकर उसके मानवीय रूप के प्रति आस्था व्यक्त करता है। देवी के मातृरूप का तो अत्यन्त हृदयग्राही वर्णन है। देवी अपने अलौकिक रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की जननी है। वह लौकिक नारी के रूप में वात्सल्यमयी माता है जो सन्तान पर वात्सल्य का अमृत बरसाती है –
‘देवी मात रे रूप तूँअम्मि श्रावे।’
जन्मदायिनी माता भगवती का साकार कृपामय स्वरूप है-
‘देवी कृपा रे रूप माता जणेता’
विनीत
डाॅ. रामकुमार दाधीच
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