Sunderkand Chaupai | Ramayan Path For Peace, Protection & Positivity | रामायण सुंदरकांड चौपाई
Автор: DhunSagarBhakti
Загружено: 2026-01-15
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Sunderkand Chaupai | Ramayan Path For Peace, Protection & Positivity | रामायण सुंदरकांड चौपाईयह दिव्य सुंदरकांड चौपाई पाठ शांति, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
🕉️यह सुंदरकांड चौपाई केवल रामकथा का एक अंश नहीं, बल्कि हर उस मन के लिए संजीवनी है जो जीवन के किसी मोड़ पर थक गया हो, टूट गया हो या मार्ग खोज रहा हो।
सुंदरकांड हमें याद दिलाता है कि जब जीवन में अंधकार हो, तब भक्ति, विश्वास और संकल्प ही सबसे बड़ा प्रकाश होते हैं।हनुमान जी का यह प्रसंग अकेले समुद्र लाँघने की कथा नहीं, बल्कि उस साहस की कहानी है जो तब जन्म लेता है जब उद्देश्य श्रीराम का हो।
यह पाठ हमें सिखाता है कि जब मन राम में स्थिर हो, तब कोई बाधा बड़ी नहीं रहती। सुंदरकांड की प्रत्येक चौपाई मन को धैर्य देना, हृदय को आश्वस्त करना और आत्मा को शक्ति देना सिखाती है।यह वही भाव है जो भय में साहस, चिंता में शांति और निराशा में आशा भर देता है।
यह पाठ उनके लिए है—
__जो संकट में हैं—
__जो उत्तर खोज रहे हैं—
__जो अपने मन को स्थिर करना चाहते हैं—
__और जो राम नाम में शरण चाहते हैं
अंत तक सुनते-सुनते मन स्वतः ही “जय सिया राम” में लीन हो जाता है —
जैसे हृदय स्वयं राम के चरणों में झुक गया हो।
✨ सुंदरकांड चौपाई का अर्थ (Meaning)
“सुंदर” का अर्थ है — मन, विचार और आत्मा को सुंदर बनाने वाला।सुंदरकांड की चौपाइयाँ हमें सिखाती हैं:
संकट में भय नहीं, विश्वास रखना
सेवा, समर्पण और निष्ठा का महत्व
जब उद्देश्य राम-काज हो, तब असंभव भी संभव हो जाता है
हनुमान जी का समुद्र लाँघना, बाधाओं को पार करना और अंत तक डटे रहना —यह सब मानव जीवन के संघर्षों का प्रतीक है।
🙏 यह पाठ क्यों सुनें?
🔸 मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा के लिए
🔸 नकारात्मकता और भय से रक्षा के लिए
🔸 ध्यान, पूजा, जप या सोने से पहले सुनने के लिए
🔸 रामभक्तों और हनुमान भक्तों के लिए विशेष
यह पाठ धीरे-धीरे मन को स्थिर करता है, इसलिए इसे अंत तक सुनें —अंत में आने वाला “जय सिया राम” भाव हृदय को भर देता है।
Lyrics :
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
📌
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