धन्य प्रेम गोपी जन त्रिभुवन | Dhanya Prem Gopijan Tribhuvan | Prem Ras Madira || Ghanshyam Bhaiya
Автор: RadhePremi
Загружено: 2024-11-10
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Prem Ras Madira Composed by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj in the Voice of Ghanshyam Bhaiya Ji.
Recorded in (Mangarh, 1980).
Prem Ras Madira - Prem Madhuri (1)
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प्रेम रस मदिरा - प्रेम माधुरी (1)
धन्य प्रेम गोपीजन त्रिभुवन, पूरण ब्रह्म जासु भरमावत
तीनों ही लोकों में उस गोपी-प्रेम को धन्य है, जिस प्रेम में बँध कर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण भी अपने आपको भूल जाते हैं
जो असंख्य ब्रह्माण्ड सृजत सो, ब्रज अहीर नँदपूत कहावत
जो पुरुषोत्तम ब्रह्म अनेक ब्रह्माण्डों का निर्माण करता है, वही ब्रजांगनाओं के प्रेम के वशीभूत होकर ब्रज में अहीर नन्द का लाल कहलाता है
जिनकी नेकु योगमाया ते, जगत नियंत्रित इति श्रुति गावत
जिस ब्रह्म की अघटित घटना-पटीयसी योगमाया के द्वारा अनन्त-कोटि ब्रह्माण्डों का नियामन, शासन होता है, जैसा श्रुतियाँ कहती हैं
उनको महरि पकरि कर- अँगुरिन, निज आँगन चलिबो सिखरावत
उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदा जी अपने आँगन में अपने हाथ की अँगुलियों के सहारे चलना सिखाती हैं
जिनकी कृपा कोर विधि हरि हर, कोटि कल्प तप करि नहिं पावत
जिस ब्रह्म की कृपा-कटाक्ष को करोड़ों कल्प तप करने पर भी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि नहीं प्राप्त कर पाते
उनको झटकि पटकि गोदी ते, भौंह तानि नँदरानि रुवावत
उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदाजी अपनी गोद से दूर फेंक कर भौंहों को टेढ़ी अर्थात् आँखें दिखाकर रुलाती हैं
जिनकी नाम गुणावलि लीला, भवबंधन छन माहिं छुटावत
जिस ब्रह्म के विविध प्रकार के नाम, गुण, लीला आदि के द्वारा भव-बंधन क्षण भर में छूट जाता है
उनको मातु बाँधि ऊखल ते, लै साँटी कर अति डरपावत
उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदा जी ऊखल में बाँधकर एवं हाथ में डण्डा लेकर अत्यन्त ही डराती हैं
जिनकी अति विचित्र माया ते, नारदादि को ज्ञान भुलावत
जिस ब्रह्म की अत्यन्त विचित्र माया से नारदादि मायातीत परमहंसों का भी ज्ञान नष्ट-सा हो जाता है
उनको देखिय ब्रज मुरली हित, गोपिन आगे दृग झरि लावत
उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को आज देखो तो, अपनी खोई हुई मुरली को ढूँढ़ता हुआ गोपियों के आगे आँसुओं की झड़ी लगा रहा है
जिनकी भृकुटि तकति बनि दासी, सो माया जो जगहिं नचावत
जिस ब्रह्म की त्रिगुणमयी माया समस्त ब्रह्माण्डों को बन्दर की तरह नचाती है, वह माया भी डर के मारे जिसकी भौंह देखती है,
उनको अब 'कृपालु' राधे जू, क्रीत दास करि पद पलुटावत ॥
'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को वृषभानुनन्दिनी राधिका जी खरीदा हुआ दास (प्राचीन काल में राजाओं के यहाँ आजन्म के लिए कुछ लोग बिके हुए गुलाम हो जाया करते थे, जो फिर अन्यत्र किसी भी प्रकार नहीं जा सकते थे, उन्हें ही क्रीत-दास कहते हैं) बनाकर अपने चरण दबवाती हैं।।
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