ऐतिहासिक बूढ़ी दिवाली 🔥 जौनसार बावर संस्कृति • बिजनू गांव
Автор: Biznaik 𝅘𝅥𝅯
Загружено: 2025-11-26
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ऐतिहासिक बूढ़ी दिवाली 🔥 जौनसार बावर संस्कृति • बिजनू गांव
नमस्ते! जौनसार-बावर में बूढ़ी दीपावली मनाने के पीछे मुख्य रूप से पौराणिक और कृषि संबंधी मान्यताएं हैं।
बूढ़ी दीपावली का इतिहास और कारण 📜
जौनसार-बावर (उत्तराखंड के देहरादून ज़िले का जनजातीय क्षेत्र)
में बूढ़ी दीपावली, जिसे दियै या मंगसीर बग्वाल भी कहा जाता है, सामान्य दीपावली के ठीक एक महीने बाद (मार्गशीर्ष/मंगसीर अमावस्या के आसपास)
मनाई जाती है। इसे मनाने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण और इतिहास जुड़े हैं:
1. पौराणिक मान्यता: श्री राम के अयोध्या लौटने की सूचना में देरी
विलंब से समाचार: सबसे प्रचलित और प्रमुख मान्यता यह है कि त्रेता युग में जब भगवान श्री राम रावण पर विजय प्राप्त करके अयोध्या लौटे (जिसकी खुशी में पूरे देश में दीपावली मनाई जाती है),
तो यह शुभ समाचार दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण जौनसार-बावर तक देर से पहुंचा।
विलंब से उत्सव: यह खबर एक महीने बाद पहुंचने पर, यहां के लोगों ने भी उस विजय और खुशी का उत्सव ठीक एक महीने बाद मनाया। इसी विलंब के कारण इसे बूढ़ी दीपावली कहा जाने लगा।
2. कृषि संबंधी महत्व: फसल कटाई का समय 🌾
फसल की व्यस्तता: कुछ स्थानीय मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार, सामान्य दीपावली (कार्तिक अमावस्या) के समय यह क्षेत्र फसल कटाई (विशेषकर धान, चौलाई, मंडुआ) के कार्यों में अत्यधिक व्यस्त रहता है।
उत्सव का समय: किसान अपनी फसल की कटाई, भंडारण और बिक्री से फायदा (लाभ) मिलने के बाद उत्सव मनाना पसंद करते थे। इसलिए, जब वे कृषि कार्यों से मुक्त हो जाते थे, तब वे यह पर्व मनाते थे, जो कि सामान्य दीपावली के एक महीने बाद आता था।
3. महाभारत काल से संबंध (अन्य मान्यता)
कुछ स्थानों पर इस त्योहार को महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि पांडवों के वनवास से लौटकर विजय प्राप्त करने के बाद पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों ने इसी खुशी में इस उत्सव की शुरुआत की थी।
बूढ़ी दीपावली के मुख्य आकर्षण ✨
यह त्योहार पांच दिनों तक चलता है और इसमें पारंपरिक लोक संस्कृति की झलक दिखती है:
होले (मशालें) जलाना: इस दौरान चीड़ या देवदार की लकड़ी के गट्ठर को होले के रूप में जलाया जाता है। ग्रामीण हाथों में मशालें (होलियात) लेकर नाचते-गाते हैं और पूरे गांव को प्रकाशित करते हैं।
पारंपरिक नृत्य और संगीत: ढोल-दमाऊ की थाप पर हारुल, तांदी, और रासो जैसे पारंपरिक लोक नृत्य सामूहिक रूप से पंचायती आंगन में किए जाते हैं।
काठ का हाथी/हिरन: कुछ गांवों में, उत्सव के समापन पर लकड़ी का हाथी या हिरन बनाकर नचाया जाता है, जिस पर गांव का मुखिया (स्याणा) बैठता है।
पारंपरिक व्यंजन: इस दौरान विशेष व्यंजन जैसे उड़द दाल के पकौड़े और चिवड़ा (भीगे हुए चावल) बनाए जाते हैं।
यह वीडियो जौनसार बावर की बूढ़ी दीपावली और उसके पारंपरिक उत्सवों को दिखाता है:
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