चालदा महासू यात्रा 2025 dasu too पसमी
Автор: mrniiku
Загружено: 2025-12-09
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चालदा महासू महाराज अब पसमी में विराजमान हो गए है जहाँ का vlog aap सभी के बीच jldi लाऊँगा
बुल्हाड़ डायरी:- आस्था का सैलाब - "छत्रधारी चालदा महाराज" भराश प्रवास यात्रा (देव यात्रा) की अदभुत बेमिसाल कहानी!
"भरमें ना जाये बिरसू भरमें ना जाये रे.... !" के उदघोष के साथ हजारों-लाखों लोगों का हुजूम निकलता है,जो स्वयं अनुशासित रहता है,का संक्षिप्त वृतांत!
"*बुल्हाड़ डायरी*" में इस बार बात करते हैं शांठीबिल में छत्रधारी चालदा महाराज के प्रवास का क्रमबद्ध विवरण जो कि 2012 से शुरू होता है जब छत्रधारी चालदा महाराज पांशीबिल प्रवास के बाद शांठीबिल में 12 साल के प्रवास पर आते हैं!
लोक मान्यता एवं परम्परा के अनुसार, देवता का प्रवास दो हिस्सों में बंटे शांठीबिल व पांशीबिल क्षेत्र में "बरवांश" (भराश) की पूजा 12 साल में एक बार निर्धारित प्रक्रिया के तहत करते हैं!शांठीबिल के बजीर श्री दीवान सिंह राणा ग्राम बास्तिल बावर चकराता, तथा पांशीबिल के बजीर श्री जयपाल सिंह पंवार ग्राम ढडियार जिला उत्तरकाशी के तहत बंटवारा किया गया है!
चार भाइयों में सबसे बड़े बाशिक महासू महाराज जो महेंद्रथ में स्थित हैं, दूसरे नंबर पर बोठा महासू महाराज हैं, जिनका सबसे प्रसिद्ध तीर्थ पीठ हनोल है, जिसे उत्तराखंड सरकार ने पांचवां तीर्थ घोषित किया है! तीसरे नंबर पर "पवासी महासू महाराज" हैं, जो "ठडियार" में स्थित हैं, और चौथे नंबर पर सबसे छोटे भाई छत्रधारी चालदा महासू महाराज हैं, जो चलायमान हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास पर जाते हैं! चालदा महाराज न केवल उत्तराखंड के जौनसार बावर और उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र में लोकप्रिय एवं पूजनीय है, बल्कि हिमाचल प्रदेश के, जूबल-शिमला क्षेत्र,और सिरमौर क्षेत्रों में पूजे जाते हैं और लोगों में बहुत लोकप्रिय देवता हैं!
लोक मान्यता के अनुसार, रात्रि में प्रवास के चलते ज्येष्ठ भाई "बाशिक महासू" ने छोटे भाई चालदा महासू को सुरक्षा कवच के रूप में अपना छत्र दिया था, जिस कारण देवता का नाम छत्रधारी नाम पड़ा! छत्रधारी चालदा महाराज चारों भाइयों में से सबसे छोटे हैं! जो चलायमान देवता हैं और उत्तराखंड और हिमाचल क्षेत्र में प्रवास पर रहते हैं!
यह देवता अपनी आस्था और परम्परा के लिए प्रसिद्ध हैं, और इनकी पूजा-अर्चना करने से लोगों को आध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि की प्राप्त और लोगों का विश्वास इन देवताओं पर बना हुआ है! इनके लाखों भक्तगण हैं!
छत्रधारी चालदा महाराज के प्रबंधन एवं परंपरा के अनुसार, बरवांश (भराश) की पूजा के लिए इनका 12 साल का प्रवास का समय निर्धारित किया गया है, जो कि शाठीबिल और पांशीबिल में बंटवारा किया है! एक साल का निर्धारित समय किसी न किसी कारण से अब बढ़कर धीरे-धीरे समय सीमा से अधिक होने लगा है! पांशीबिल प्रवास के बाद शांठीबिल आने की यात्रा प्रवास विवरण निम्न प्रकार से रहा है!
पांशीबिल बरवांश प्रवास की 12 साल की पूजा के बाद वर्ष 2012 में छत्रधारी चालदा महाराज पांशीबिल से "शांडीबिल" में पधारें जो 2012 से 2014 में "कोटी बाबर" में प्रवास पर रहे तथा 2015 'कोटी बाबर' से एक साल के प्रवास के लिए चालदा महाराज "मुथोल" (देवगार खत) में प्रवास पर रहे तथा 2016 से "थंगाड़" हगाड़टा खत हिमाचल प्रदेश पहुंचे जहां पर एक साल प्रवास के बाद "थंगाड़" से एक साल प्रवास के लिए"जनोग" गये (जोथरोऊ- हिमाचल)! वहां से एक साल प्रवास के बाद "तरोच" 2017 में पहुंचे और एक साल वहां रहने के बाद 2018 में "तरोच" से "कोटी-कनासर"के लिए प्रस्थान किया!
छत्रधारी चालदा महाराज ने इस यात्रा के दौरान, उन्होंने निम्न स्थानों पर रात्रि विश्राम किया:
24 नवंबर 2018: तरोच से प्रस्थान कर पोड़िया बागड़ी प्रवास,
25 नवंबर 2018: घूरला गांव तहसील चौपाल, हिमाचल प्रदेश में बागड़ी,
26 नवंबर 2018: नेरुवा, तहसील चौपाल
27 नवंबर 2018: बांदूर गांव, तहसील चौपाल, शिमला में बागड़ी प्रवास,
28 नवंबर 2018: अटाल, तहसील त्यूनी
29 नवंबर 2018: बंढियारा खेड़ा, कान्डोई, भरम
30 नवंबर 2018: कोटी कनासर गांव में बागड़ी प्रवास, तथा दूसरे दिन 1 दिसंबर को कोटि गांव में नदाण परिवार के मकान में जो चालदा महाराज के प्रवास के लिए चिह्नित किया गया है एक साल के बाद उसमें प्रवास करते हैं!
2019 में, छत्रधारी चालदा महाराज कोटी में एक साल के प्रवास के बाद मोहना गांव के लिए प्रस्थान करते हैं, इस दौरान, उन्होंने निम्न स्थानों पर रात्रि विश्राम किया:
20 नवंबर 2019: कोटी से बुल्हाड़ गांव, जहां पर श्री रतन सिंह रावत/प्रताप सिंह रावत (झमनाण परिवार) के घर में रात्रि विश्राम किया!
21 नवंबर 2019: गोरचछा गांव में,
22 नवंबर 2019 को गोरचछा से लोखंडी होते हुए जाड़ी गांव में बागड़ी प्रवास,
23 नवंबर 2019: मोहना मंदिर, जहां पर एक साल के प्रवास के लिए स्थापित हुए लेकिन कोरोना के कारण वहां ढेड़ साल से अधिक समय तक रुकना पड़ा! मोहना गांव में नवंबर 2021 तक महाराज प्रवास पर हैं!
2021 में, छत्रधारी चालदा महाराज ने मोहना से समाल्टा गांव के लिए प्रस्थान किया, जहां वह एक साल के प्रवास के लिए स्थापित हुए! इस दौरान, उन्होंने निम्न स्थानों पर रात्रि विश्राम किया:
22 नवंबर 2021 मोहना से ठाणा गांव के लिए प्रस्थान तथा बागड़ी प्रवास,
23 नवंबर 2021: समाल्टा गांव पहुंचे
29 अप्रैल 2023 को छत्रधारी चालदा महाराज ने समाल्टा गांव से दसऊ (पशंगाव खत जिसे जेठी खत भी कहा जाता है) के लिए प्रस्थान किया, जहां उन्होंने नवंबर 2025 तक प्रवास किया। इस दौरान, उन्होंने निम्न स्थानों पर रात्रि विश्राम किया:
29 व 30 अप्रैल 2023: नराया गांव बागड़ी प्रवास
1 मई 2023: दसऊ गांव खत पशंगाव में जहां पर नवंबर 2025 तक प्रवास किया!
8 दिसंबर 2025 को श्री छत्रधारी चालदा महाराज दसऊ मंदिर से "पश्मी" सिरमौर जिला हिमाचल प्रदेश के लिए 1 साल के प्रवास के लिए मंदिर से बाहर
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