मछिंद्रनाथ महाराज द्वारा प्रदत्तप्रचंड बलशाली मोहिनी शाबर मंत्र
Автор: Mantra - Tantra - Yantra ( मंत्र - तंत्र - यंत्र )
Загружено: 2025-12-18
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मंत्र तंत्र यंत्र चैनल में आप सभी का स्वागत है आज मैं आप सभी के लिए मछिंद्रनाथ महाराज का मोहिनी शाबर मंत्र लेकर आया हूं
यह कोई साधारण मंत्र नहीं है।
यह है नाथ संप्रदाय के महान सिद्ध,
मछिंद्रनाथ महाराज द्वारा प्रदत्त
प्रचंड बलशाली मोहिनी शाबर मंत्र।
जिस साधक पर मछिंद्रनाथ महाराज की कृपा हो जाती है, उसके व्यक्तित्व में एक अद्भुत आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। लोग स्वयं उसकी ओर खिंचे चले आते हैं।
कलियुग में,
जब अपना ही मनुष्य
आपकी बात नहीं सुनता…
जब प्रेम में उपेक्षा मिलती है…
जब समाज में आपका प्रभाव कम हो जाता है…
तब यह मंत्र
साधक के भीतर
एक ऐसी अदृश्य शक्ति को जागृत करता है,
जिसे नज़रअंदाज़ करना
किसी के लिए भी आसान नहीं होता।
कहा जाता है…
जिस पर मछिंद्रनाथ महाराज की कृपा हो जाए,
उसके शब्दों में वजन आ जाता है…
उसकी आँखों में आकर्षण उतर आता है…
और उसके व्यक्तित्व के सामने
कठोर से कठोर मन भी
पिघलने लगता है।
मछिंद्रनाथ महाराज का
दिव्य मोहिनी शाबर मंत्र…
अगर कोई भी साधक इस मंत्र को स्वयम जपना चाहे तो इस विधी से जाप कर सकते है
या साधना आप किसी एकांत स्थान मे या किसी शिवालय मे कर सकते है
स्नानादी से निवृत्त होकर आसन बिछा कर पूर्व दिशा की और मुख करके बैठे जाप के लिए रुद्राक्ष की माला लेले
सर्वप्रथम गणेश जी के मंत्र की एक माला का जाप करे ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जप कर सकते है
तपश्चात अगर आपके गुरु है और उन्होने आपको मंत्र दिया है तो उस गुरु मंत्र की एक माला का जाप करे अगर गुरु मंत्र नही है शिवजी को आपना गुरु मानकर ॐ नमः शिवाय मंत्र के एक माला का जप करे
तत्पष्टात इस मच्छिंद्रनाथ जी के मोहिनी शाबर मंत्र का जाप 11, 21, 51 या 108 बार अपने सामर्थता अनुसार कर सकते है
माया मच्छिंद्रनाथ जी का मोहिनीं शाबर मन्त्र:-
सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।
ॐ गुरुजी मैं औघड़ तो अवधूत का चेला।
तीन लोक की कामिनियों की सेज पर सोऊँ अकेला।
मढ़ी मसाण में धूणी घाली।
कुआँ ऊपर चारपाई डाली।
रक्तयों भैरव रक्त चलावें।कपाल भैरव तन मन डिंगावें।
रूरू भैरव यौवन भड़कावे।
मसाण भैरव अंग अंग में काम वासना जगावें।
काल भैरव पीड़ चलावें।मुख बावें।डाढ़ चलावें।
उढां गढ्या बावें बाण।औघड़ शक्ति किया कबाण।
अघोर तन्त्र मन्त्र यन्त्र ध्याय।साधे पीर आसन भरपूर।
अन्त समय में पकड़ा चीर।
कामाक्षा देवी उठाया निर्भय निषाण।
बंगाल खण्ड कामरू देश में चलें गुरु गोरक्ष नाथजी की आण।
बंगाल खण्ड कामरू देश की कामाक्षा देवी।
जहाँ बसे सहजा बाई योगिन का पुत्र इस्माईल योगी।इस्माईल योगी ने लगाई एक बाड़ी।
बाड़ी को सींचे फूला मालिन।
बाड़ी की रखवाली करें गांगली तेलिन।
बाड़ी में उपजी लौंग और सुपारी।
लौंग सुपारी तोड़े लोना चमारि।
लौंग सुपारी खाये सुरह गाय।
सुरह गाय को चरावें कपूरी धोबिन।
पानी पीती सुरह गाय ने किया गौबर कीन्हां।
सरिया कुम्हारी उसको लीन्हा।
सूर्य नारायण सन्मुख नैना योगिन उसे सुखाया।
डाल आँगन में लाल लुहारी ने उसे जलाया।
बनी विभुति आसो मेहतरानी लाई।
सहजा बाई योगिन ने लिलाट में उस विभुति को लगा चौपटा मढ़ी मसाण में फेंकी।
उस विभुति से जागिया काल भैरव।
काल भैरव काली जटा।
कानों कुण्डल हाथ गदा।
काल भैरव हाजिर हजूर खड़ा दसों दिशा।
काल भैरव चार प्रहर खेंले चौपटा।
बैठ नगर में सुमरुं तोय।सबकी दृष्टि बाँध दे मोहिं।
हथेली बसे हनुमान काल भैरव बसे कपाल।
माया मछिन्द्रनाथ जी की मोहिनीं मोहें सकल संसार।
तेल तेल महातेल।देंखु मोहिनीं माई तेरा खेल।
मोहिनीं माई जहाँ पठाई तहाँ ही जाये।
मढ़े का तेल चूं चूं गिरें।जिसके लगाऊँ उसी के लगें।
हमारा बन्धन कभी न छूटें।अष्ट कुली नाग मोहूँ।
तीन कुली बिच्छू मोहूँ।सवालाख भुतावली मोहूँ।
नवनाड़ी बहत्तर कोठा मोहूँ।तरह सौ तन्त्र मोहूँ।
चौदह सौ मन्त्र मोहूँ।पन्द्रह सौ यन्त्र मोहूँ।
इन्द्र का इन्द्रासन मोहूँ।शेषनाग का पाताल लोक मोहूँ।परशुराम जी का फरशा मोहूँ।
गौरां पार्वती माई की बिंदियां मोहूँ।
स्वर्ग लोक की उर्वशी अप्सरा मोहूँ।
सहजा बाई योगिन की बिछियां मोहूँ।
सती सावित्री बाई का सत मोहूँ।
हनुमान जी का ब्रम्हचर्य व्रत मोहूँ।
मेंघनाद की गर्जना मोहूँ।राह चलता राहगीर मोहूँ।
गद्दी बैठा बणिया मोहूँ।पंचायत करते पंच मोहूँ।
आसन बैठा जोगी मोहूँ।
धूणी तपता दर्शनी मोहूँ।चिता में जलता मुर्दा मोहूँ।
मढ़ी मसाण जगाता अघोरी मोहूँ।
बाद खेलता बादिगर मोहूँ।मूठ चलाता मुठ्यारा मोहूँ।
सात जाति छत्तीस पवन मोहूँ।मढ़ी मसाण चौपटा मोहूँ।महलों बैठी राणी मोहूँ।पनघट की पणिहारी मोहूँ।
चलती फिरती कामणगारी मोहूँ।डाकिनी शाकिनी मोहूँ।
भूत प्रेत शैतान मोहूँ।घूंघट करती कामिनी मोहूँ।
जोग साधती जोगिन मोहूँ।भोग करती भोगिन मोहूँ।
भोजन करता नर मोहूँ।यौवन में मदमाती नारी मोहूँ।
कलश रखती कुँवारी कन्या मोहूँ।
बावन वीर चौसठ योगिनी छप्पन कलुआ मोहूँ।
नवग्रह बारह राशि सोलह तिथि सात वार दो पक्ष सत्ताईस नक्षत्र मोहूँ।
जल मोहूँ जलवाही मोहूँ मोहूँ कुआँ खाई।
राम लखन सीता माई मोहूँ श्रीनाथजी गुरुजी की कोटि कोटि दुहाई।
और को देखें जल भुनें मोय देख पायन पड़ें।
जो कोई काटे गुरु गोरक्ष नाथ जी का वाचा।
अन्धा कर लूला कर सीड़ी बोरा कर अग्नि में जलाय दें।
धरी को बताय दे।गढ़ी को दिखाय दे।
रूठे को मनाय दे।खोये को मिलाय दें।
बैरी दुश्मन को सताय दें।मित्रों को बढ़ाय दें।
वाचा छोड़ कुवाचा करें।
तो माता कालिका देवी का पिया दूध हराम करें।
महादेव जी और गौरां पार्वती माई की आन।
नवनाथ चौरासी सिद्धों को प्रणाम।
ब्रम्हा विष्णु महेश भरें उनकी साँख।
तीन लाख तैतीस हज़ार वीर पैग़म्बरों की आन।
उनको भी सलाम।
सतगुरु के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम।
माता अंजनी राजा रामचन्द्र लक्ष्मण जति सती सीता माई की आन।
आदिशक्ति कालिका देवी की आन।
मेरी भक्ति गुरु शक्ति।शब्द साँचा पिण्ड काँचा।
फुरो मन्त्र ईश्वरों वाचा।देखों सिद्धों माया मछिन्द्रनाथ की मोहिनीं माई का तमाशा।
सत्यनाम आदेश गुरु का।।
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