गणमेश्वर बाबा, पिथौरागढ़ ॥ अटूट आस्था सहित मा० कुलपति प्रो० एन०एस० भण्डारी जी द्वारा साझा जानकारी..
Автор: आध्यात्मिक और धार्मिक
Загружено: 2021-02-03
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इस अंचल के लोकधर्म में गणमेश्वर (गढ़वालिंग), जो साक्षात शिव माने गए हैं, के अतिरिक्त इनके शिष्य द्योगड़िया (दोगड़िया) जो न्याय के देवता और असीम शक्ति के स्वामी माने जाते हैं, की अत्यधिक मान्यता है। गणमेश्वर, द्योगड़िया (दोगड़िया) के संबंध में जो लोककथा प्रचलित है वह इस प्रकार है-
रूमा व बेन्नी ग्राम जो शकुन ग्रामसभा, सौन पट्टी मूनाकोट ब्लॉक के अंतर्गत है, से कोई तीन किलोमीटर दूर काली नदी के तट पर, जहां नदी नेपाल की तरफ गोलाई में बहती है, नेपाल से एक नाला कर मिलता है। इस स्थान में नेपाल की तरफ एक सरोवर है, जिसे देवताल या सतजुगी (सतयुगी) ताल कहा जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार इसकी उत्पत्ति सतयुग में मानी गई है। इसमें स्नान वर्जित है। इससे लगी एक गुफा है, जिसके अंदर एक लिंग है जिसे त्रिलोकीनाथ गणमेश्वर का लिंग माना जाता है। यही स्थान 'गढ़वालिंग' महाराज का मूल मंदिर है। यह मंदिर नेपाल के रोड़ी रंतौली व भारत के सौन पट्टी के अतिरिक्त पिथौरागढ़ जिला निवासियों का आराध्य स्थान है। बाबा गणमेश्वर के इसके अतिरिक्त ४ मंदिर तीन नेपाल व १ भारतीय क्षेत्र में स्थित है।
इन मंदिरों के बारे में प्रचलित लोक कथा इस प्रकार है-
कालांतर में हिमाल से मां भगवती की जात डोला अपने गणों के साथ काली नदी से होकर तराई भाबर की ओर जा रहा था। उनके द्वारा कहा गया कि अगर कोई मुझे रोक सकने में सक्षम है तो रोके! उनके प्रस्ताव को बाबा गणमेश्वर ने स्वीकारा और विशाल आकृति ग्रहण कर डोले को रोक लिया। उनकी विशाल आकृति का आंकलन इस प्रकार किया जाता है- उन्होंने अपने चरण देवताल में स्थिर के सिर चमड़ामाणु (तोली, नेपाल) धड़ का भाग बिजुल (नेपाल), दांया हाथ रूम (भारत), बांया हाथ बन्ना (नेपाल) तक फैला दिये थे। गणमेश्वर महाराज ने भगवती जांत को रोका तो मां ने किसी रमणीक स्थान पर स्थापना की इच्छा प्रकट की जिसके फलस्वरुप गणमेश्वर महाराज ने उनको, रोड़ी जो नैपाल क्षेत्र में स्थित है, एक रमणीक स्थल पर स्थापित किया। यहां पर दुर्गा अष्टमी के दिन प्रसिद्ध मेला लगता है जिसमें भारतीय क्षेत्र के लोग भी हिस्सेदारी करते हैं। जहां-जहां तक विशाल आकृति के अंग फैले थे वहां पर 'फुटलिंग' प्रकट हुए। फुटलिंग से तात्पर्य है धरती से प्रकट लिंग। इन स्थानों पर मंदिर स्थापित किए गए। इनको तांबे के ढक्कन से ढक कर रखा जाता है, पुजारी द्वारा पूजा के दौरान इसकी सफाई करने के बाद पुनः ढक कर रखा जाता है। गणमेश्वर सदा सहायक व कुशल क्षेम के देवता माने जाते हैं। जिन्हें कष्ट निवारण दाता के रूप में पूजा जाता है। प्राचीन समय में इस अंचल में धरभाषा-हल्दू का लटाधारी मसाण का आतंक था जो सुनसान, निर्जन, नदी नालों में विचरण करता पशुओं का वध करने के साथ ही यहां के निवासियों को भांति-भांति से सताता था। क्षेत्र की जनता ने आतंकित व दुखी होकर गणमेश्वर को पुकारा। गणमेश्वर बाबा ने हल्दू में घमासान संघर्ष के बाद बलशाली मसाण को परास्त किया। लटाधारी मसाण ने मरने से पूर्व अपने पुत्र के लिए अभय दान मांगते हुए उसे 'गोद' लेने की विनती की। मसाण पुत्र भी काफी बलशाली था। गणमेश्वर बाबा ने लटाधारी मसाण की इच्छा अनुसार द्योगड़िया को न्याय के देवता का वरदान देते हुए सात जंजीरों से बांधकर देवताल में अपने चरणों में रख लिया। जंजीरों से बांधकर रहने के कारण के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने उसको स्वच्छन्द बनने से रोकने के लिए ऐसा किया तब से मसाण पुत्र न्याय की पुकार होने पर होने पर अपने गुरु (गणमेश्वर) की आज्ञा पर अपनी प्रजा में प्रकट होकर न्याय करते हैं। उस अंचल में प्रचलित लोक मान्यताओं में १२ मसाणों का जिक्र आता है जिसमें द्योगड़िया को १२ मसाणों के मसाण अर्थात् महाबली के रूप में मान्यता है।
बाबा द्योगड़िया की न्याय के देवता के रूप में मान्यता स्थानीय स्तर पर मान्यता प्राप्त पूछ या गंत पद्धति से देखी जा सकती है।
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