राजविद्या और राजगुह्य के गूढ़ आध्यात्मिक सिद्धांतों पर चिंतन
Автор: Chetna Samvad – Ramesh Chauhan
Загружено: 2026-01-05
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“गीता-योग: अध्यात्मिक प्रबोधन की श्रवण यात्रा” के आज के इस विशेष एपिशोड में हम भगवद्गीता के नौवें अध्याय में वर्णित राजविद्या और राजगुह्य के गूढ़ आध्यात्मिक सिद्धांतों पर चिंतन करते हैं।
इस चर्चा में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उस परम ज्ञान से परिचित कराते हैं जिसे सब विद्याओं का राजा और सब रहस्यों का राजा कहा गया है। यह ज्ञान न केवल पवित्र और अविनाशी है, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव के योग्य भी है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारक होते हुए भी समस्त कर्मों से पूर्णतः निर्लिप्त और साक्षी भाव में स्थित रहते हैं।
इस एपिशोड में हम समझते हैं कि किस प्रकार ईश्वर अपनी योगमाया के माध्यम से प्रकृति का संचालन करते हैं, और कैसे अज्ञानवश जीव जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि केवल अटूट श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के द्वारा ही मनुष्य संसार के दुखों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है।
यह श्रवण यात्रा हमें ईश्वर की सर्वव्यापकता, उनकी अदृश्य शक्ति और उनके दिव्य साक्षी स्वरूप को समझने का अवसर देती है—और जीवन को एक गहरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा प्रदान करती है।
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