VRINDAVAN KA RAJA NANPURA | first Ganesh aagman surat | LALBAUG CHA RAJA 2024 MANDAP REVEAL!
Автор: Exploring india_19
Загружено: 2024-08-06
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भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में 10 दिनों का उत्सव मनाया जाता है जो गणेश चतुर्थी से शुरू होता है. गणेश चतुर्थी के दिन बप्पा को घर लाया जाता है और 10 दिनों तक विधि विधान से उनकी पूजा करने के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन उनका विसर्जन कर दिया जाता है. इस साल गणेश चतुर्थी 7 सितंबर को मनाई जाएगी.
भगवान गणेश को सौभाग्य, समृद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है. ऐसे में गणेश पूजन से घर में सुख समृद्धि का वास होता है. मान्यता ये भी है कि गणेश उत्सव के 10 दिनों तक भगवान गणेश पृथ्वी पर ही रहते हैं और अपने भक्तों के ष्टों को दूर करते हैं. ऐसे में भक्त भी बप्पा को प्रसन्न करने के लिए हर जतन करते हैं. महाराष्ट्र, गोवा और तेलंगाना आदि राज्यों में यह त्योहार काफी लोकप्रिय है. इन राज्यों में गणपति जी के विशाल पंडाल लगते हैं. इस दिन सभी घरों में भगवान गणेश की प्रतिमा का भव्य स्वागत किया जाता है. साथ ही गणेश चतुर्थी का व्रत भी रखा जाता है. इस तिथि को व्रत रखने से व्रती को जीवन में सुख- समृद्धि और अनेक लाभ प्राप्त होते हैं.
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है. पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था. गणेशोत्सव के दौरान सभी लोग बप्पा घरों में विराजमान होते हैं और 10 दिनों तक उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है. किसी भी नए काम की शुरूआत से पहले भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा है. गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है जो आपके जीवन में आने वाले सभी दुख- दर्द को दूर करते हैं. गणेश उत्सव मनाने की परंपरा महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से ही है.
गणेशोत्सव की शुरुआत महाराष्ट्र की राजधानी पुणे से हुई थी. गणेश चतुर्थी का इतिहास मराठा साम्राज्य के सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ा है. मान्यता है कि भारत में मुगल शासन के दौरान अपनी सनातन संस्कृति को बचाने हेतु छत्रपति शिवाजी ने अपनी माता जीजाबाई के साथ मिलकर गणेश चतुर्थी यानी गणेश महोत्सव की शुरुआत की थी.
छत्रपति शिवाजी द्वारा इस महोत्सव की शुरुआत करने के बाद मराठा साम्राज्य के बाकी पेशवा भी गणेश महोत्सव मनाने लगे. गणेश चतुर्थी के दौरान मराठा पेशवा ब्राह्मणों को भोजन कराते थे और साथ ही दान पुण्य भी करते थे. पेशवाओं के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में हिंदुओं के सभी पर्वों पर रोक लगा दी लेकिन फिर भी बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी के महोत्सव को दोबारा मनाने की शुरूआत की. इसके बाद 1892 में भाऊ साहब जावले द्वारा पहली गणेश मूर्ति की स्थापना की गई थी
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