तुगलकाबाद क़िले का इतिहास | Tughlakabad Fort Delhi History in Hindi | Tughlakabad Kile Ka Itihas |
Автор: Mr India Vlogs
Загружено: 2025-05-13
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गयासुद्दीन तुग़लक़ का मक़बरा: इतिहास
गयासुद्दीन तुगलक, जिनका मूल नाम गाजी मलिक था, ने 1320 ईस्वी में तुगलक वंश की नींव रखी। उन्होंने अपने शासनकाल में एक विशाल और मजबूत किले, तुगलकाबाद का निर्माण करवाया। और इसी किले के दक्षिणी हिस्से में, एक कृत्रिम झील के बीच, ऊँचे चबूतरे पर उन्होंने अपने जीवनकाल में ही इस मकबरे का निर्माण शुरू करवाया था। इस मकबरे की वास्तुकला अपने आप में अनूठी है। पहली नज़र में यह किसी छोटे किले जैसा प्रतीत होता है। इसकी दीवारें लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं और थोड़ी अंदर की ओर झुकी हुई हैं, जो तुगलक वास्तुकला की एक खास पहचान है। यह झुकाव इमारत को मजबूती और भव्यता दोनों प्रदान करता है।
इन लाल दीवारों के ऊपर सफेद संगमरमर का यह खूबसूरत गुंबद! यह कंट्रास्ट (विपरीतता) अद्भुत है। मकबरे की योजना पंचकोणीय (Pentagonal) है, जो उस समय के मकबरों में बहुत आम नहीं थी। इसे एक ऊँचे, मजबूत परकोटे से घेरा गया है, और मुख्य किले से यह एक लंबे पुल या कॉजवे (causeway) द्वारा जुड़ा हुआ था, जिसके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। मकबरे के अंदर तीन कब्रें हैं। बीच की कब्र स्वयं सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की है। उनके एक ओर उनकी पत्नी मखदुमा-ए-जहाँ की कब्र बताई जाती है, और दूसरी ओर उनके पुत्र मुहम्मद बिन तुगलक की। हालांकि, कुछ इतिहासकार मुहम्मद बिन तुगलक की कब्र यहाँ होने पर मतभेद रखते हैं। अंदर का हिस्सा बाहर की तरह भव्य न होकर सादा है, लेकिन इसमें एक अजीब सी शांति और गंभीरता का एहसास होता है। मेहराब और दीवारों पर कुरान की आयतों की बारीक नक्काशी भी देखने को मिलती थी, जिसके कुछ अंश आज भी मौजूद हैं।
समय के थपेड़ों और उपेक्षा के बावजूद, गयासुद्दीन तुगलक का यह मकबरा आज भी अपनी शान से खड़ा है। यह हमें उस दौर की इंजीनियरिंग और कलात्मक दृष्टि की याद दिलाता है।
यह मकबरा इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह सल्तनत काल की वास्तुकला की सादगी और मजबूती का प्रतीक है, जो बाद के मुगलकालीन मकबरों की भव्यता और अलंकरण से बिल्कुल अलग है। यह न केवल एक शासक की कब्रगाह है, बल्कि उस युग की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति का भी प्रतिबिंब है।
इसकी ढलुआं दीवारें, मजबूत संरचना और रणनीतिक स्थिति, सुल्तान गयासुद्दीन के सैन्य स्वभाव और दूरदर्शिता को दर्शाती हैं। जब सूरज की आखिरी किरणें इस लाल पत्थर के मकबरे और सफेद गुंबद पर पड़ती हैं, तो इसकी खूबसूरती और भी निखर उठती है। यह हमें याद दिलाता है कि साम्राज्य बनते और बिगड़ते हैं, शासक आते और जाते हैं, लेकिन कला और इतिहास हमेशा जीवित रहते हैं।
गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा दिल्ली की उन अनमोल धरोहरों में से एक है, जिन्हें सहेज कर रखना हमारी जिम्मेदारी है। यह हमें अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ता है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता है।
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