सफर , तुम और यादों की हवा... Kabhi pahadon ki chhupi me....
Автор: the mansuria
Загружено: 2026-01-20
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सफर , तुम और यादों की हवा... Kabhi pahadon ki chhupi me.... Safar, tum aur yado ki hawa.... Ghazal
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कभी पहाड़ों की चुप्पी में आपकी आवाज़ मिली,
कभी समंदर की लहरों में आपकी यादें मिली।
हर सफ़र पर निकला तो यही समझ में आया,
रास्तों से ज़्यादा मुझे आपकी चाहतें मिली।
हवा ने पूछा मुझसे, क्यों इतना ठहर-सा गया हूँ,
मैंने कहा—इन पलों में मुझे आपकी आहटें मिली।
रेल की खिड़की से जब सूरज ढलता देखा,
हर रंग में आपकी आँखों की शरारतें मिली।
कभी काग़ज़ पर उकेरीं मैंने दूर की वादियाँ,
कभी हथेली में आपकी उँगलियों की हरकतें मिली।
शहर बदलते रहे, लोग बदलते रहे मगर,
हर मोड़ पर मुझे आपकी ही आदतें मिली।
बारिश ने जब पहली बार मिट्टी को छुआ,
उस खुशबू में आपकी पहली मुलाक़ातें मिली।
एक अनजान से गाँव में, पेड़ों की छाँव तले,
ख़ामोशी में लिपटी हुई आपकी बातें मिली।
मैंने जब खुद को ढूँढा लम्बे सफ़रों में,
तो हैरानी हुई—मुझमें आपकी चाहतें मिली।
कभी चाय के धुएँ में, कभी आग के अलाव में,
हर सर्द रात में आपकी ही राहतें मिली।
पैरों ने थक कर जब आराम माँगा मुझसे,
दिल ने कहा—चलो, अभी तो आपकी राहें मिली।
सितारों से भरी रातों में जब सिर उठाकर देखा,
आसमान में टँगी हुई आपकी हसरतें मिली।
आप साथ नहीं थे, फिर भी कमी महसूस न हुई,
क्योंकि हर मंज़र में आपकी मौजूदगी मिली।
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