धर्म को मत छोड़ रे । व्यवस्था के नाम पर तू,
Автор: आत्मन
Загружено: 2026-01-17
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धर्म को मत छोड़ रे ।
व्यवस्था के नाम पर तू,
धर्म को मत छोड़ रे ।।
है व्यवस्थित सर्व ही जग, है व्यवस्थित मुक्ति का मग।
चले जोड़ न तोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे ।। 1 ।।
परिणमन स्वाधीन है सब, समझ पंच समवाय तू अब। दृष्टि अपनी मोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे ।।2।
पर रूप तो होती नहीं है, निज रूप भी तजती नहीं है। वस्तु है बेजोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे ।।3
पर में करना कुछ नहीं है, लेना देना भी नहीं है। दुर्विकल्प तू छोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे । ।4।
पाप का जब तक उदय हो, नहीं निमित्त सहाय का हो। व्यर्थ आशा तोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे ।।5।।
पुण्य का जब तक उदय हो, नहीं निमित्त सु दण्ड का हो। द्वेष भाव तू छोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे ।।6।। कर व्यवस्थित अपनी मति तू, त्याग पर में रति अरति तू। निज में परिणति जोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे ।।7।
चाम दाम अरु काम पर तू, साधनों के नाम पर तू। परिग्रह मत जोड़ रे,
धर्म को मत छोड़ रे ।।8।
।भवितव्य तो अनिवार ही है,
तू तो जाननहार ही है।
कर्त्ता बुद्धि छोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे।।9।
। कल्पना पर मांहि सुख की, जननी है संसार दुख की।
दुराग्रह तू छोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे।।10।
। चित्त में प्रभु को बसा ले, ज्ञान की ज्योति जगा ले। बढ़ तू शिव की ओर रे, धर्म को मत छोड़ रे ।।11।। कुछ नहीं संकोच करना, सहज ही संतोष धरना। ये ही अन्तिम मोड़ रे, धर्म को मत छोड़ रे । ।12 ।।
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