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रामचरितमानस मूलपाठ: किष्किन्धाकाण्ड(दोहा:२२-३०)

Автор: RamcharitManas-Kashi

Загружено: 2025-10-23

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रामचरितमानस मूलपाठ: किष्किन्धाकाण्ड प्लेलिस्ट

   • रामचरितमानस मूलपाठ: किष्किन्धाकाण्ड  

दो. बचन सुनत सब बानर
जहँ तहँ चले तुरंत ।
तब सुग्रीवँ बोलाए
अंगद नल हनुमंत ॥ २२ ॥

सुनहु नील अंगद हनुमाना।
जामवंत मतिधीर सुजाना ॥
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू।
सीता सुधि पूँछेउ सब काहू ॥
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु।
रामचंद्र कर काजु सँवारेहु ॥
भानु पीठि सेइअ उर आगी।
स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी ॥
तजि माया सेइअ परलोका।
मिटहिं सकल भव संभव सोका ॥
देह धरे कर यह फलु भाई।
भजिअ राम सब काम बिहाई ॥
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी ।
जो रघुबीर चरन अनुरागी ॥
आयसु मागि चरन सिरु नाई।
चले हरषि सुमिरत रघुराई ॥
पाछें पवन तनय सिरु नावा।
जानि काज प्रभु निकट बोलावा ॥
परसा सीस सरोरुह पानी।
करमुद्रिका दीन्हि जन जानी ॥
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु।
कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु ॥
हनुमत जन्म सुफल करि माना।
चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना ॥
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता।
राजनीति राखत सुरत्राता ॥

दो. चले सकल बन खोजत
सरिता सर गिरि खोह।
राम काज लयलीन मन
बिसरा तन कर छोह ॥ २३ ॥

कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा।
प्रान लेहिं एक एक चपेटा ॥
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं।
कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं ॥
लागि तृषा अतिसय अकुलाने।
मिलइ न जल घन गहन भुलाने ॥
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना।
मरन चहत सब बिनु जल पाना ॥
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा।
भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा ॥
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं।
बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं ॥
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा।
सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा ॥
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा।
पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा ॥

दो. दीख जाइ उपवन बर
सर बिगसित बहु कंज।
मंदिर एक रुचिर तहँ
बैठि नारि तप पुंज ॥ २४ ॥

दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा।
पूछें निज बृत्तांत सुनावा ॥
तेहिं तब कहा करहु जल पाना।
खाहु सुरस सुंदर फल नाना ॥
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए।
तासु निकट पुनि सब चलि आए ॥
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई।
मैं अब जाब जहाँ रघुराई ॥
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू।
पैहहु सीतहि जनि पछिताहू ॥
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा।
ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा ॥
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा।
जाइ कमल पद नाएसि माथा ॥
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही।
अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही ॥

दो. बदरीबन कहुँ सो गई
प्रभु अग्या धरि सीस ।
उर धरि राम चरन जुग
जे बंदत अज ईस ॥ २५ ॥

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं।
बीती अवधि काज कछु नाहीं ॥
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता।
बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता ॥
कह अंगद लोचन भरि बारी।
दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी ॥
इहाँ न सुधि सीता कै पाई।
उहाँ गएँ मारिहि कपिराई ॥
पिता बधे पर मारत मोही।
राखा राम निहोर न ओही ॥
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं।
मरन भयउ कछु संसय नाहीं ॥
अंगद बचन सुनत कपि बीरा।
बोलि न सकहिं नयन बह नीरा ॥
छन एक सोच मगन होइ रहे।
पुनि अस वचन कहत सब भए ॥
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना।
नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना ॥
अस कहि लवन सिंधु तट जाई।
बैठे कपि सब दर्भ डसाई ॥
जामवंत अंगद दुख देखी।
कहिं कथा उपदेस बिसेषी ॥
तात राम कहुँ नर जनि मानहु।
निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु ॥
हम सब सेवक अति बड़भागी।
संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥

दो. निज इच्छा प्रभु अवतरइ
सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ
रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥ २६ ॥

एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती।
गिरि कंदराँ सुनी संपाती ॥
बाहेर होइ देखि बहु कीसा।
मोहि अहार दीन्ह जगदीसा ॥
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ।
दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ ॥
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा।
आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा ॥
डरपे गीध बचन सुनि काना।
अब भा मरन सत्य हम जाना ॥
कपि सब उठे गीध कहँ देखी।
जामवंत मन सोच बिसेषी ॥
कह अंगद बिचारि मन माहीं।
धन्य जटायू सम कोउ नाहीं ॥
राम काज कारन तनु त्यागी ।
हरि पुर गयउ परम बड़ भागी ॥
सुनि खग हरष सोक जुत बानी ।
आवा निकट कपिन्ह भय मानी ॥
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई।
कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई ॥
सुनि संपाति बंधु कै करनी।
रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी ॥

दो. मोहि लै जाहु सिंधुतट
देउँ तिलांजलि ताहि ।
बचन सहाइ करबि मैं
पैहहु खोजहु जाहि ॥ २७ ॥

अनुज क्रिया करि सागर तीरा।
कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा ॥
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई ।
गगन गए रबि निकट उडाई ॥
तेज न सहि सक सो फिरि आवा ।
मै अभिमानी रबि निअरावा ॥
जरे पंख अति तेज अपारा ।
परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ॥
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही।
लागी दया देखी करि मोही ॥
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा ।
देहि जनित अभिमानी छड़ावा ॥
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही।
तासु नारि निसिचर पति हरिही ॥
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता।
तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ॥
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता ।
तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता ॥
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू ।
सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू ॥
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका ।
तहँ रह रावन सहज असंका ॥
तहँ असोक उपबन जहँ रहई ॥
सीता बैठि सोच रत अहई ॥

दो. मैं देखउँ तुम्ह नाहीं
गीधहि दृष्टि अपार।
बूढ़ भयउँ न त करतेउँ
कछुक सहाय तुम्हार॥ २८ ॥

जो नाघइ सत जोजन सागर ।
करइ सो राम काज मति आगर ॥
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा ।
राम कृपाँ कस भयउ सरीरा ॥
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं।
अति अपार भवसागर तरहीं ॥
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई।
राम हृदयँ धरि करहु उपाई ॥
अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ।
तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ ॥
निज निज बल सब काहूँ भाषा।
पार जाइ कर संसय राखा ॥


शेष यहाँ:
https://sanskritdocuments.org/doc_z_otherl...

रामचरितमानस मूलपाठ: किष्किन्धाकाण्ड(दोहा:२२-३०)

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