श्री कृष्ण का मौन दर्द | Sad & Powerful Rap | Goosebumps rap
Автор: BHAKTI MUSIC & RAP
Загружено: 2026-01-01
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श्री कृष्ण केवल भगवान नहीं, बल्कि त्याग, कर्तव्य और अंतहीन पीड़ा का नाम हैं।
इस भावुक रैप में श्री कृष्ण के जीवन के सभी द्वंद्व, युद्ध का बोझ, अपनों का त्याग और मौन वेदना को शब्दों में पिरोया गया है।
यह रैप सुनकर हृदय भारी हो जाएगा और आत्मा तक स्पर्श करेगा।
🙏 हे कृष्ण, यह रचना आपके चरणों में समर्पित है।
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Rap lyrics :-
[Intro]
[फुसफुसाती वाणी]
गोपाल बालक नहीं
अग्नि-पथ का एक अकेला पथिक
हास्य के पीछे छुपा
अश्रु-मुक्ताओं का अनन्त वर्षा
[Verse 1]
नन्द के आँगन जन्म, कंस का भय, रक्त का चक्र
सूनी अर्धरात्रि, यमुना साक्षी, डगमग डग
एक ओर ममता की ऊष्मा, एक ओर वध की आज्ञा
नवजात शिशु, किन्तु कंधों पर, योगेश्वर की युक्ति का बोझ
गोद में मैया यशोदा, नेत्रों में अनन्त प्रश्न
"किस लोक से आया बालक, क्यों दिखते तारे तुझमें?"
मुस्कान हल्की, पर भीतर घनघोर घोर संशय
"मेरा न भी रहूँ, सबका बनूँ" यह कठोर संकल्प
वृन्दावन रास में पलक पलक, मुरली रचती अलिखित ग्रन्थ
हर गोपी का हृदय-पत्र, पढ़ता चुपचाप अनन्त
ताली, हँसी, झंकार, पर भीतर मौन समाधि
प्रेम बाँटता सबको, अपने लिए एक बिन्दु भी नहीं
[Chorus]
[गंभीर स्वर, दीर्घ तान]
हे कन्हैया, तेरे हृदय का मौन क्रन्दन
कौन सुनेगा यह मौन क्रन्दन
सबको देता आनन्द अनन्त
अपने भीतर सहता क्लेश, अग्नि, बन्धन
[Verse 2]
राधा की आँखों में सृष्टि, पर पथ पर द्वारका लिखित
एक ओर मधुर मिलन, दूसरी ओर वियोग-समृति
"जा रहा हूँ" कह न सका, बस बाँसुरी रख दी शून्य में
वृन्दावन की धूल में छूट गई, उसकी स्वर्गीय निःश्वास
रथ के पहिए घूमे, रणभूमि बना धर्म-सभा
अर्जुन का कम्पित धनुष, तेरे भीतर और दुविधा
"मित्र बचाऊँ? कुल बचाऊँ? या धर्म के लिए सब अर्पण?"
हर उत्तर में अपना ही हृदय चढ़ा यज्ञ की अग्नि पर
"कर्मण्येवाधिकारस्ते" कहना भी था एक त्याग
जिससे प्रेम था तूने ही, उसी का किया परित्याग
अपना सखा, अपना स्नेह, गीता के श्लोकों में विलीन
हर शब्द एक तेज़ शर जैसा, जो खुद तुझी में प्रविष्ट
[Chorus]
[Chorus]
[Bridge]
[निम्न स्वर, मन्द ताल]
द्वारका के स्वर्ण-महल में भी, अन्तःपुर का गहन शून्य
रुक्मिणी की शीतल छाया, फिर भी भीतर जलता ध्रुव
युद्धों की जयध्वनि, शंख-नाद, बाह्य जगत में कीर्ति
रात्रि में केवल तू और तू, और आँसू की मौन गीति
यदुवंशी वंश का पतन, अपने ही तीर्थ-हाथों से
वन में एक साधारण बाण, विदीर्ण किया दिव्य देह
परम योगी भी जब रोया, वह रोना था निःशब्द
"मैं भी था केवल मानव सा," यह गहन, अदृश्य सत्य
[Chorus]
[Chorus]
MADE IT AI
[Outro]
[मन्द वेणु, क्षीण स्वर]
गोपाल, माधव, देव, मित्र, कितने रूपों का असंग जाल
हर नाम में था त्याग तेरा, हर रूप में एक निष्कल काल
हँसी की झलक में छुपा तप, लीला के पीछे महात्याग
जो सुन ले तेरे मौन विलाप को
उसका हृदय हो जाता विराग
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