काया नगर में जीव मुसाफिर काहे करें उन्माद रे//संत अमृत साहेब//
Автор: Kartavya se Kalyan Tak
Загружено: 2026-01-19
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काया नगर में जीव मुसाफिर, काहे करें उन्माद रे
यह भजन हमें जीवन की सच्चाई का बोध कराता है। यह शरीर रूपी नगर में आत्मा केवल एक मुसाफिर है, फिर घमंड, मोह और उन्माद क्यों? यह रचना वैराग्य, आत्मचिंतन और ईश्वर-भक्ति की ओर प्रेरित करती है।
भजन के शब्द मन को झकझोरते हैं और याद दिलाते हैं कि यह संसार क्षणभंगुर है, सत्य केवल प्रभु का नाम है।
इस भजन को सुनकर मन शांत होता है और जीवन के सही मार्ग का बोध होता है।
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