#रेंगा_कोरकू_के_इतिहास
Автор: Korku news
Загружено: 2022-07-11
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...........वीर रेंगा कोरकू..........
आदिवासी क्रांतिकारी वीर महानायकों की इतिहास देखा जाऐ । तो आदिवासीयों के इन विद्रोहों की शुरुआत प्लासी युद्ध ( 1757 ) के ठीक बाद ही शुरू हो गयी थी और यह संघर्ष बीसवीं सदी की शुरुआत तक रहा ।। जिसमें सन ( 1857 ) की क्रांति की चिंगारी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐसी भडकी की देखते ही देखते पूरे भारत में जंगल में लगी आग की तरह फैल गई । ब्रिटिश हुकूमत से छुटकारा पाने के लिए भारत के कई शासक आवाज उठा रहे थे और कई उनकी फूट डालो शासन करो की नीति के शिकार हो रहे थे । अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचार और उनकी गुलामी से आजादी पाने के लिए भारत के हर वर्ग जाति सम्प्रदाय के लोग अपने अपने स्तर से लोहा ले कर संघर्ष कर रहे थे ।, एक तरफ भारत का ह्रदय मध्य प्रदेश का पूर्व निमाड़ अंचल खंडवा जिले के रॉबिनहुड जननायक टंट्या भील अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के नाक में दम कर रखा था
वही दूसरी तरफ होशंगाबाद जिले के आदिवासी अंचल का एक छोटा सा गाँव सोनखड़ी का वीर योद्धा रेंगा कोरकू अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों से बचाने वाले आदिवासियों की रक्षा करने वाला, एवं जल जमीन जंगल और ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ विंदया,सह्याद्रि और सतपुड़ा क्षेत्रों में आवाज उठाने वाला , जो आज इतिहास के पन्नों से कोसों दूर है ,जो कही एक नींव का पत्थर बना हुआ है । वो है आदिवासी जनजातियों का जननायक '' वीर रेंगा कोरकू''
यह आजादी हमें यूं ही नहीं मिली। इसके लिए न जाने कितने आदिवासी फांसी के फंदे पर झूले थे और न जाने कितनों ने गोली खाई थी, तब जाकर हमने यह आजादी पाई थी। देश ऋणी है उन आदिवासी क्रांतिवीरों का जिन्होंने देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
आज देश आज़ादी के 75 साल: हुए!लेकिन आदिवासी तो दुनिया बनने से लेकर आज़ादी तक गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया! परंतु दु:ख इस बात का है! इतिहास में कुछ खास लोगों को ही जगह मिली।
इतिहासकार.....राजेश बैठेकर दिल्ली
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