Phir kuch ik dil ko beqaraari hai by Shailly Kapoor
Автор: Shailly Kapoor
Загружено: 2016-01-05
Просмотров: 26579
Sung by: Shailly Kapoor
Poet: Mirza Ghalib
Music: Jagjit Singh
फिर कुछ इक दिल को बेक़रारी है
सीना जूया ए ज़ख़्म ए कारी है
चश्म दल्लाल ए जिन्स ए रुसवाई
दिल ख़रीदार ए ज़ौक़ ए ख़्वारी है
दिल हवा ए ख़िराम ए नाज़ से फिर
मेह्शारिस्तान ए बेक़रारी है
जलवा फिर अर्ज़ ए नाज़ करता है
रोज़ ए बाज़ार ए जाँ सिपारी है
फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है
हो रहा है जहान में अंधेर
ज़ुल्फ़ की फिर सरिश्ता-दारी है
फिर खुला है दर ए अदालत ए नाज़
गर्म बाज़ार ए फ़ौज-दारी है
फिर दिया पारा ए जिगर ने सवाल
एक फ़रयाद ओ आह ओ ज़ारी है
फिर हुए हैं गवाह ए इश्क़ तलब
अश्क-बारी का हुक्म जारी है
फिर जिगर खोदने लगा नाख़ून
आमद ए फ़सल ए लालाकारी है
दिल ओ मिज़गां का जो मुक़दमा था
आज फिर उस कि रूब-कारी है
बे-ख़ुदी बे सबब नहीं ग़ालिब
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
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