चंचल मन ये जीता जिसने..... । कवि अमन अक्षर।
Автор: Mr Indian Trekker
Загружено: 2021-12-19
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कवि अमन अक्षर रचित प्रेमरस की अनुपम कविता
चंचल मन ये जीता जिसने , तुम में ऐसा कोई है ।
एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥
बस्ती बस्ती गीत लिए हम , अपनी बातें कहते हैं ।
कुछ गीतों की नईया ले हम , अपनी नदियाँ गहते हैं ॥
मन जब तुमसा होकर अक्सर , हमसे झगड़ा करता है ।
तब लगता है मन भीतर सब , लोग तुम्हारे रहते हैं ॥
अपनी होनी अनहोनी भी , एक ही साँस पिरोई है ।
एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥
भावुकता का सूरज निस दिन , चढ़ता और उतरता है ।
याद का चन्दा नियमित आकर , ठण्डी आँहें भरता है ॥
जीवन तुम तक सीमित होकर , पूरी दुनिया जैसा है ।
तुमसे बाहर आकर अपनी , छाया से भी डरता है ॥
प्यार की दुनिया में ही हमने , अपनी दुनिया बोई है ।
एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥
किसी कल्पना लोक में बीते , वो जीवन ही अच्छा है ।
इन तर्कों वाली दुनिया से , प्रेमी मन ही अच्छा है ॥
आस का हर पत्ता आखिर जब , उस डाली से टूट गया ।
यूँ लगता है प्रीतम अपना , खालीपन ही अच्छा है ॥
मन बैठी इक लड़की अक्सर , ऐसा सुन कर रोइ है ।
एक तुम्हारे पीछे हमने , अपनी सुध-बुध खोई है ॥
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