भजन कर,सेवा कर सतगुरु की।शबद सुन,यही पार लगाना॥नहीं तो काल है चबाना,पल में सब ले जाना।
Автор: संतों की वाणी
Загружено: 2026-01-20
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भजन कर,
सेवा कर सतगुरु की।
शबद सुन,
यही पार लगाना॥
नहीं तो काल है चबाना,
पल में सब ले जाना।
अंतरा 1
साँस उधारी, देह मुसाफ़िर,
क्षण भर का ठिकाना।
आज जो नाम न सुमिरा तूने,
कल कौन बचाना॥
धन-दौलत, मान-अभिमान,
यहीं धरे रह जाना।
नाम बिना इस भव-सागर से,
कोई न पार लगाना॥
भजन कर,
सेवा कर सतगुरु की।
शबद सुन,
यही पार लगाना॥
अंतरा 2
काल खड़ा है द्वार पे देखे,
कब मन भरमाए।
माया की मीठी बातों में,
जीव को चबाए॥
ना देखे रिश्ते, ना देखे उम्र,
ना देखे ज्ञान-सयाना।
सतगुरु की शरण जो न आया,
उसका बचना न ठिकाना॥
नहीं तो काल है चबाना…
अंतरा 3
ना मैं योगी, ना मैं ज्ञानी,
ना तप का अभिमान।
सतगुरु चरणों शीश झुकाकर,
माँगूँ बस नाम दान॥
शबद की धुन जब भीतर जागे,
टूटे काल का दाना।
नाम की नाव जो थाम ले प्राणी,
उसका पार लग जाना॥
भजन कर,
सेवा कर सतगुरु की।
शबद सुन,
यही पार लगाना॥
अंतरा 4
नरक-स्वर्ग सब मन के फेरे,
सच तो भीतर वास।
नाम बिना जो जीवन जिया,
वो जीवन बस उपहास॥
आख़िर दम तक यही चेतावनी,
यही सच्चा समझाना।
नाम पकड़ ले आज ही प्राणी,
नहीं तो काल है चबाना॥
समापन (धीमे दोहराव में)
भजन कर…
सेवा कर सतगुरु की…
शबद सुन…
यही पार लगाना…
नहीं तो…
काल है चबाना…
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