कुल का नाश और सामाजिक पतन | Bhagavad Gita Adhyay 1 Shlok 43 | Arjun Vishad Yoga
Автор: GYAN SANGRAH
Загружено: 2025-12-29
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कुल का नाश और सामाजिक पतन | Bhagavad Gita Adhyay 1 Shlok 43 | Arjun Vishad Yoga
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै: | उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: || ४३ ||
Description
Namaste! 🙏
इस वीडियो में हम श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुन विषाद योग) के 43वें श्लोक की गहराई से व्याख्या करेंगे।
श्लोक में क्या है? जब अर्जुन कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अपने प्रियजनों को सामने देखते हैं, तो उनका मन विचलित हो जाता है। इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं कि युद्ध से न केवल लोग मरते हैं, बल्कि कुल की परंपराएं (Kula-dharma) और सामाजिक व्यवस्था भी नष्ट हो जाती है।
इस वीडियो में आप जानेंगे:
श्लोक 43 का शुद्ध संस्कृत उच्चारण।
अर्जुन द्वारा बताए गए 'कुल-धर्म' और 'जाति-धर्म' का महत्व।
युद्ध के कारण समाज में होने वाले दोषों (Varnasankar) का अर्थ।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनमोल ज्ञान को समझने के लिए हमारे साथ जुड़ें।
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