Ep85: Jain Darshan: Man,Soch aur Antarik Yatra | Aavashyakta aur Ichchha mein Antar | Jinvani Shorts
Автор: JINVANI SHORTS 🇮🇳
Загружено: 2026-01-17
Просмотров: 590
जय जिनेन्द्र।
हमारी श्रृंखला
“जैन दर्शन: मन, सोच और आंतरिक यात्रा”
में आपका स्वागत है।
इस श्रृंखला के पाँचवें भाग में
हम उसी आंतरिक यात्रा को
और आगे बढ़ाते हैं,
जो अब तक
विचार और इच्छा की समझ के साथ
हमारे भीतर स्पष्ट होती आई है —
“आवश्यकता और इच्छा में अंतर”
पिछले भाग में
हमने यह समझने का प्रयास किया था कि
इच्छा
विचार का ही दूसरा नाम नहीं है,
बल्कि
विचार के बाद
मन में उत्पन्न होने वाली
एक अलग प्रवृत्ति है।
उसी समझ के आगे
अब एक अगला प्रश्न
स्वाभाविक रूप से सामने आता है —
यदि इच्छा
अपने आप में
बंधन नहीं है,
लेकिन
बंधन की दिशा बनाती है,
तो फिर
आवश्यकता और इच्छा में
वास्तविक अंतर क्या है?
इस भाग में
हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि
आवश्यकता और इच्छा
देखने में भले ही
एक जैसी प्रतीत हों,
लेकिन
जैन दर्शन की दृष्टि से
उनकी भूमिका
और परिणाम
एक जैसे नहीं हैं।
हम यह भी देखेंगे कि
साधारण उपयोग
किस बिंदु पर
आवश्यकता का रूप लेता है,
और कब
वही उपयोग
मन में
इच्छा की तरह
स्थिर होने लगता है।
इस चर्चा में
यह समझने का प्रयास भी किया जाएगा कि
जब आवश्यकता और इच्छा का भेद
मन में स्पष्ट नहीं रहता,
तो किस प्रकार
बाहरी वस्तुओं पर
आश्रय का भ्रम
धीरे–धीरे बनता चला जाता है।
यह चर्चा
किसी निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं है,
बल्कि
अपने भीतर चल रही
इस सूक्ष्म प्रक्रिया को
शांत भाव से देखने का प्रयास है —
ताकि यह स्पष्ट हो सके कि
बंधन
वस्तुओं से नहीं,
बल्कि
मन की मान्यता से
दिशा पकड़ता है।
⏱️ Chapters
00:00 Intro
हम अभी सीखने का प्रयास कर रहे हैं,
और जो भी समझ साझा कर रहे हैं,
वह अध्ययन और मनन पर आधारित है।
उद्देश्य केवल इतना है कि
जैन दर्शन की गहराई
आज की भाषा में
सहज रूप से समझी जा सके।
📚 शोध व स्रोत (Research & References)
इस एपिसोड में दी गई सारी जानकारी
केवल जैन शास्त्रों और आचार्य–ग्रंथों पर आधारित है।
किसी भी बाहरी दर्शन,
आधुनिक मनोविज्ञान
या अन्य धर्मग्रंथ का उपयोग नहीं किया गया है।
👉 मुख्य संदर्भ ग्रंथ:
• श्री तत्त्वार्थ सूत्र — आचार्य उमास्वामी जी
• श्री समयसार — आचार्य कुन्दकुन्द जी
यह चर्चा
इन्हीं ग्रंथों में प्रतिपादित
तत्त्वों और सीमाओं के भीतर रहकर
की गई है।
आवश्यकता और इच्छा के इस भेद को समझने के बाद
अब एक और प्रश्न
स्वाभाविक रूप से सामने आता है —
यदि वस्तुएँ
बंधन का कारण नहीं हैं,
तो फिर
मन
वस्तुओं की ओर
क्यों खिंचने लगता है?
यही प्रश्न
हमें अगले भाग की ओर ले जाता है।
भाग 6 — “राग क्या है”
इसी विषय पर
हम अगले भाग में
शांत और स्पष्ट रूप से
चर्चा करेंगे।
ज़रूर सुनिए।
🎧 Podcast Series Info
श्रृंखला / Podcast:
Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra
भाग: 5 (Ep85)
🔹 Presented by: Rushabh Jain & Jinvani Shorts
🔹 Research & Script: Jain Shastras based study
🔸 Narration: AI Voice (Directed by Rushabh Jain)
🔸 Editor: Rushabh Jain
✅ 100% Original content — researched, written & produced by our team.
यह वीडियो
हमारी स्वयं की अध्ययन–प्रक्रिया पर आधारित है।
हम अभी सीखने की कोशिश कर रहे हैं
और जैन दर्शन को
सरल भाषा में समझने का प्रयास कर रहे हैं।
📅 नया भाग
क्रमबद्ध रूप से जारी किया जाएगा।
इसलिए जुड़े रहिए
इस आंतरिक यात्रा के
अगले चरण के साथ।
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जय जिनेन्द्र।
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