स्वादिष्ट भोजन भी एक समय में अस्वादिष्ट प्रतीत होने लगता हैं ऐसा क्यों 🤔(विष्णु पुराण पौराणिक कथाएं)
Автор: Naresh Kumar
Загружено: 2025-11-15
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ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
'नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम ।
देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत"।।
श्री विष्णुपुराण
(द्वितीय अंश)
"बारहवाँ अध्याय"161120251007
"ऋभु का निदाघ को अद्वैतज्ञानोपदेश"
श्रीपराशरजी बोले ;– हे मैत्रेय ! ऐसा कहने
पर, राजा को मौन होकर मन-ही-मन
सोच-विचार करते देख वे विप्रवर यह
अद्वैत-सम्बन्धी कथा सुनाने लगे-
ब्राह्मण बोले ;– हे राजशारर्दूल ! पूर्वकाल में
महर्षि ऋभु ने महात्मा निदाघ को उपदेश
करते हुए जो कुछ कहा था वह सुनो -
हे भूपते ! परमेष्ठी श्रीब्रह्माजी का ऋभु नामक
एक पुत्र था, वह स्वभाव से ही परमार्थतत्त्व
को जाननेवाला था।पूर्वकाल में महर्षि पुलस्त्य
का पुत्र निदाघ ऋभु का शिष्य था | उसे
उन्होंने अति प्रसन्न होकर सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान
का उपदेश दिया था। हे नरेश्वर ! ऋभु ने देखा
कि सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान होते हुए भी
निदाघ की अद्वैत में निष्ठा नहीं है।
उस समय देविका नदी के तट पर पुलस्त्यजी
का बसाया हुआ सम्पन्न नगर था।
हे पार्थिवोत्तम! ऋभु का शिष्य योगवेत्ता
निदाघ रहता था।महर्षि ऋभु अपने दिव्य
निदाघ को देखने के लिये एक सहस्त्र दिव्यवर्ष
बीतने पर उस नगर में गये जिस समय
निदाघ बलिवैश्व देव के अनन्तर अपने द्वार
पर प्रतीक्षा कर रहा था,वे उसके दृष्टिगोचर हुए
और वे द्वार पर पहुँचकर उसे अर्घ्यदानपूर्वक
अपने घर में ले गये।उस द्विजश्रेष्ठ ने उनके
हाथ-पैर धुलाये और फिर आसन पर बैठाकर
आदरपूर्वक कहा – ‘भोजन कीजिए।
निदाघ ने कहा ;– हे द्विजश्रेष्ठ ! मेरे घर में सत्तू,
जौ की लाप्सी, कंद-मूल-फलादि तथा पोए बने
हैं | आपको इनमें से जो कुछ रुचे वही
भोजन कीजिये।
ऋभु बोले ;– हे द्विज ! ये तो सभी कुत्सित
अन्न है, मुझे तो तुम हलवा, खीर तथा मट्ठा
और खांड से बने स्वादिष्ट भोजन कराओ।
तब निदाघ ने अपनी स्त्री से कहा ;–
हे गृहदेवि ! हमारे घर में जो अच्छी से अच्छी
वस्तु हो उसी से इनके लिये अति स्वादिष्ट
भोजन बनाओ।
ब्राह्मण जडभरत ने कहा ;– उसके ऐसा कहने
पर उसकी पत्नी ने अपने पति की आज्ञा से उन
विप्रवर के लिये अति स्वादिष्ट अन्न तैयार किया।
हे राजन ! ऋभु के यथेच्छ भोजन कर लेने
के बाद निदाघ ने अति विनीत होकर उस
महामुनि से कहा -
हे द्विज ! बताईए भोजन करके आपका
चित्त स्वस्थ हुआ या नहीं? आप पूर्णतया तृप्त
और संतुष्ट हुए या नहीं ?हे विप्रवर ! बताईए
आप कहाँ के रहने वाले हैं ? कहाँ जाने की
तैयारी में हैं ? और अभी अभी कहाँ से पधारे हैं ?
ऋभु बोले ;– हे ब्राह्मण ! जिसको क्षुधा लगती
है उसकी तृप्ति भी हुआ करती है | मुझे तो
कभी क्षुधा ही नहीं लगी, फिर तृप्ति के विषय में
तुम क्या पूछते हो ?जठराग्नि के द्वारा
पार्थिव धातुओं के क्षीण हो जाने से मनुष्य को
क्षुधा यानी भूख की प्रतीति होती है और जल
के क्षीण होने से तृषा(प्यास) का अनुभव होता है।
हे द्विज ! ये क्षुधा और तृषा तो देह के ही धर्म है,
मेरे नहीं; अत: स्वस्थता और तुष्टि भी मन में ही
होते हैं, अत: ये भी मन के ही धर्म है, पुरुष
(आत्मा) से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है | इसलिये
हे द्विज ! ये जिसके धर्म है उसी से इनके विषय
में पूछो और तुमने जो पूछा कि ‘आप कहाँ रहने
वाले है ? कहाँ जा रहे है ? तथा कहाँ से आये हैं ‘
तब इन तीनों के विषय में मेरा मत सुनो-
आत्मा सर्वगत है, क्योंकि यह आकाश के समान
व्यापक है; अत: ‘कहाँ से आये हो, कहाँ रहते हो
और कहाँ जाओगे ?’ यह कथन भी कैसे
सार्थक हो सकता है ?मैं तो न कहीं जाता हूँ,
न आता हूँ और न किसी एक स्थान पर रहता हूँ |
[ तू, मैं और अन्य पुरुष भी देहादि के कारण जैसे पृथक-पृथक दिखायी देते है वास्तव में वैसे नहीं है]
वस्तुत: तू तू नहीं हैं, अन्य अन्य नहीं है और
मैं मैं नहीं हूँ ।
वास्तव में मधुर,मधुर नहीं है; देखो, मैंने तुमसे
जो मधुर अन्न की याचना की थी उससे भी
मैं यही देखना चाहता था कि ‘ तुम क्या कहते हो।
हे द्विजश्रेष्ठ ! भोजन करनेवाले के लिये
स्वादु और अस्वादु भी क्या है ? क्योंकि
स्वादिष्ट पदार्थ ही जब समयांतर से अस्वादु हो
जाता है तो वही उद्वेगजनक होने लगता है।
इसी प्रकार कभी अरुचिकर पदार्थ रुचिकर
हो जाते है और रुचिकर पदार्थों से मनुष्य को
उद्वेग हो जाता है | ऐसा अन्न भला कौन –सा है
जो आदि, मध्य और अंत तीनों काल में
रुचिकर ही हो ?जिस प्रकार मिट्टी का घर
मिट्टी से लीपने – पोतने से दृढ़ होता है,
उसी प्रकार यह पार्थिव देह पार्थिव अन्न के
परमाणुओं से पुष्ट हो जाता है।जौ, गेहूँ,
मूँग, घृत, तेल, दूध, दही, गुड़ और फल आदि
सभी पदार्थ पार्थिव परमाणु ही तो है | [ इनमें से
किसको स्वादु कहें और किसको अस्वादु ? ]
अत: ऐसा जानकर तुम्हें इस स्वादु-अस्वादु
का विचार करनेवाले चित्त को समदर्शी बनाना
चाहिये, क्योंकि मोक्ष का एकमात्र उपाय
समता ही है।
ब्राह्मण बोले ;– हे राजन ! उनके ऐसे परमार्थमय
वचन सुनकर महाभाग निदाघ ने उन्हें प्रणाम
करके कहा- “प्रभो !कृपया बतलाइये, मेरे
कल्याण की कामना से आये हुए आप कौन है ?
हे द्विज ! आपके इन वचनों को सुनकर
मेरा सम्पूर्ण मोह नष्ट हो गया है”।
ऋभु बोले ;– हे द्विज ! मैं तेरा गुरु ऋभु हूँ;
तुझे सदबुद्धि प्रदान करने के लिये मैं यहाँ
आया था | अब मैं जाता हूँ, जो कुछ परमार्थ है
वह मैंने तुझ से कह ही दिया है। इस
परमार्थतत्त्व का विचार करते हुए तू इस
सम्पूर्ण जगत को एक वासुदेव परमात्मा का
ही स्वरूप जान; इसमें भेद-भाव बिल्कुल
नहीं है।
ब्राह्मण बोले ;– तदनंतर निदाघ ने उन्हें प्रणाम
किया और फिर उससे परम भक्तिपूर्वक पूजित हो
ऋभु स्वेच्छानुसार चले गये।
"इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितियेंऽशे द्वादशोऽध्याय:"
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