Powerful VASUDEV SUTAM DEVAM - KRISHNA ASHTAKAM by Adi Shankaracharya for Divine Peace & Protection
Автор: Chanting India
Загружено: 2026-01-18
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🌼 Vasudeva Sutam Devam is a sacred invocation that glorifies Lord Krishna, the eternal Supreme Being who manifested on Earth as the son of Vasudeva and Devaki to restore dharma and dissolve darkness. This mantra bows to the divine incarnation of Narayana, who descended in human form while remaining infinite, timeless, and all-pervading.
Chanting “Vasudeva Sutam Devam” awakens remembrance of Krishna’s divine birth—when the cosmos rejoiced, chains broke, and fear dissolved in the presence of pure consciousness. The mantra vibrates with leela (divine play), karuna (compassion), and prema (unconditional love), gently guiding the seeker from worldly illusion toward eternal truth.
🍀 Each repetition invokes Krishna as:
• The indwelling soul of all beings
• The remover of ignorance and sorrow
• The embodiment of bliss, wisdom, and divine protection
This mantra carries a serene yet powerful energy that calms the restless mind, purifies the heart, and fills the devotee with bhakti and inner joy. When chanted with devotion, it creates a sacred space where the presence of Lord Krishna is deeply felt—soft, compassionate, playful, yet infinitely powerful.
Listening to or chanting this mantra regularly invites peace, divine grace, and spiritual awakening, aligning the devotee with the eternal rhythm of the universe and the loving guidance of Shri Krishna.
🍀 Audio Credits
Vocals- @PARULMISHRA
Music- Aniket Kar
Label - Chanting India
🍀 Vasudeva Sutam Devam in Sanskrit with Meaning
🌼 वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १ ॥
Meaning - वसुदेव के पुत्र, स्वयं भगवान, कंस और चाणूर के संहारकर्ता और माता देवकी को परम आनंद प्रदान करने वाले जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं वंदन करता हूँ।
🌼 अतसीपुष्पसङ्काशं हारनूपुरशोभितम् ।
रत्नकङ्कणकेयूरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २ ॥
Meaning - अतसी पुष्प के समान (नीले) वर्ण वाले, हार और नूपुर से शोभित, रत्नजड़ित कंकण और बाजूबंद धारण किए हुए, ऐसे जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं वंदन करता हूँ।
🌼 कुटिलालकसम्युक्तं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ।
विलसत्कुण्डलधरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ३ ॥
Meaning - मैं उन कृष्ण को नमन करता हूँ, जिनके घुंघराले, सुंदर केश उनके मुखमंडल की शोभा बढ़ाते हैं। जिनका मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान मनोहर है। जो अपने कानों में विलसित, झिलमिलाते कुण्डल धारण किए हुए हैं। ऐसे जगद्गुरु कृष्ण को मैं श्रद्धापूर्वक वंदन करता हूँ।
🌼 मन्दारगन्धसम्युक्तं चारुहासं चतुर्भुजम् ।
बर्हिपिञ्छावचूडाङ्गं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ४ ॥
Meaning - मैं उन कृष्ण को नमन करता हूँ जिनके दिव्य स्वरूप से मंदार पुष्प की सुरभि सदा प्रवाहित होती है, जिनका मोहक मंद हास्य हृदय को आनंद से भर देता है। जो चतुर्भुज रूप में परम तेजस्वी और आलौकिक प्रतीत होते हैं। जिनके मुकुट की शोभा बढ़ाने वाला मोरपंख सुशोभित है, जो उनकी अद्भुत छवि को और भी मनोहर बनाता है। ऐसे जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं श्रद्धापूर्वक वंदन करता हूँ।
🌼 उत्फुल्लपद्मपत्राक्षं नीलजीमूतसन्निभम् ।
यादवानां शिरोरत्नं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ५ ॥
उन्मुक्त और कोमल कमल के खिली हुई पत्तियों के समान नेत्रों वाले, नीले मेघ के समान अत्यंत सुंदर, मोहक और लावण्य से परिपूर्ण श्री कृष्ण, जो यादव वंश के शिरोमणि, दिव्य और सर्वगुण सम्पन्न, कृपा और प्रेम के सागर हैं। जो भक्तों के ह्रदय में रमे हुए हैं, ऐसे जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं श्रद्धापूर्वक वंदन करता हूँ।
🌼 रुक्मिणीकेलिसम्युक्तं पीताम्बरसुशोभितम् ।
अवाप्ततुलसीगन्धं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ६ ॥
Meaning - रुक्मिणी के साथ प्रेममयी लीला में लीन, पीताम्बर वस्त्र से सुशोभित भगवान श्री कृष्ण, जिनके दिव्या शरीर में तुलसी की पवित्र गंध व्याप्त है, ऐसे जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं श्रद्धापूर्वक वंदन करता हूँ।
🌼 गोपिकानां कुचद्वन्द्वकुङ्कुमाङ्कितवक्षसम् ।
श्रीनिकेतं महेष्वासं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ७ ॥
Meaning - मैं उन श्रीकृष्ण को प्रणाम करता हूँ जिनका हृदय गोपिकाओं के प्रेमरस में रंगे कुमकुम-चिह्नों से सुशोभित है, वही हृदय जहाँ श्री (लक्ष्मीजी) स्वयं वास करती हैं और जो महान धनुर्धारी हैं। ऐसे जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं श्रद्धापूर्वक वंदन करता हूँ।
🌼 श्रीवत्साङ्कं महोरस्कं वनमालाविराजितम् ।
शङ्खचक्रधरं देवं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ८ ॥
Meaning - जिनके वक्ष पर श्रीवत्स चिह्न है, जो विशाल वक्ष वाले हैं, जिनके गले में वनमाला शोभा पा रही है, जो शंख और चक्र धारण करते हैं। ऐसे जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं वंदन करता हूँ।
कृष्णाष्टकमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
कोटिजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥ ९ ॥
इति श्री कृष्णाष्टकम् ॥
Meaning - यह कृष्णाष्टकं अत्यंत पवित्र है। जो व्यक्ति प्रातः काल उठकर इसे पढ़ता है, वह करोड़ों जन्मों के किए गए पापों को केवल स्मरण से नष्ट कर देता है।
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