Dharti ki shaan tu hai- धरती की शान तू भारत की सन्तान
Автор: Sangh Geetmala -संघ गीतमाला
Загружено: 2018-05-01
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‘‘धरती की शान तू’’
धरती की शान तू भारत की सन्तान
तेरी मुठ्ठियों में बन्द तूफ़ान है रे
मनुष्य तु बडा महान है भूल मत
मनुष्य तु बडा महान् है ॥धृ॥
तु जो चाहे पर्वत पहाडों को फोड दे
तु जो चाहे नदीयों के मुख को भी मोड दे
तु जो चाहे माटी से अमृत निचोड दे
तु जो चाहे धरती को अम्बर से जोड दे
अमर तेरे प्राण मिला तुझको वरदान
तेरी आत्मा में स्वयं भगवान है रे॥१॥
नयनों में ज्वाल तेरी गती में भूचाल
तेरी छाती में छुपा महाकाल है
पृथ्वी के लाल तेरा हिमगिरी सा भाल
तेरी भृकुटी में तान्डव का ताल है
निज को तू जान जरा शक्ती पहचान
तेरी वाणी में युग का आव्हान है रे ॥२॥
धरती सा धीर तु है अग्नी सा वीर
तु जो चाहे तो काल को भी थाम ले
पापों का प्रलय रुके पशुता का शीश झुके
तु जो अगर हिम्मत से काम ले
गुरु सा मतिमान पवन सा तू गतिमान
तेरी नभ से भी ऊँची उडान है रे ॥३॥
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