कश्मीरी बच्ची अमाल बनी फरिश्ता अनू झिंडे के साथ मिलकर मौत के जबड़े से छीना आर्या को | tum se tum tak
Автор: Amit Rajput talks
Загружено: 2026-01-23
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कश्मीरी बच्ची अमाल बनी फरिश्ता अनू झिंडे के साथ मिलकर मौत के जबड़े से छीना आर्या को | tum se tum tak अनु के लिए घर की दहलीज पार करना आसान नहीं था। चारों तरफ खतरा था और परिवार वाले डरे हुए थे। लेकिन अनु की जिद और उसके प्यार की ताकत के आगे सबको झुकना पड़ा। सिद्धि माता का आशीर्वाद और शर्मा जी की सहमति लेकर, अनु ने अपने सुहाग को बचाने के लिए घर से कदम बाहर निकाला। बाहर वफादार झिंडे गाड़ी लेकर तैयार खड़ा था। अनु की आँखों में आंसू थे, लेकिन इरादे चट्टान की तरह मजबूत थे।
अनु और झिंडे कश्मीर की खतरनाक वादियों में पहुँच गए। वहाँ का मौसम जितना ठंडा था, हालात उतने ही गर्म थे। हर तरफ दुश्मनों का पहरा था। आर्यावर्धन कहाँ कैद है, इसका कोई सुराग नहीं मिल रहा था। झिंडे अपनी पूरी ताकत लगा रहा था, लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा था। अनु हताश होकर सड़क किनारे बैठ गई और भगवान से रास्ता दिखाने की प्रार्थना करने लगी।
तभी वहाँ एक चमत्कार हुआ। बादलों के बीच से जैसे कोई नन्हीं किरण आई हो, वैसे ही एक छोटी सी कश्मीरी बच्ची, जिसका नाम अमाल था, उनके पास आई। अमाल ने अपनी मासूम आवाज में पूछा कि वो किसे ढूंढ रहे हैं। जब अनु ने रोते हुए आर्या की तस्वीर दिखाई, तो अमाल की आँखें चमक उठीं। उसने इशारे से बताया कि उसने इस आदमी को देखा है और वो जानती है कि दुश्मनों ने उसे कहाँ छिपा रखा है।
अमाल किसी फरिश्ते से कम नहीं थी। वो अनु और झिंडे को उन खुफिया रास्तों से ले गई, जहाँ से दुश्मन उन्हें देख नहीं सकते थे। बर्फीले तूफ़ान और दुश्मनों की नजरों से बचते हुए, यह तीनों उस खंडरनुमा इमारत तक पहुँच गए जहाँ आर्या को बंधक बनाकर रखा गया था।
वहाँ का नजारा देख अनु का दिल दहल गया। आर्या बुरी तरह घायल और बेहोश था। दुश्मनों ने उसे घेर रखा था। अब बारी थी आर-पार की लड़ाई की।
योजना के मुताबिक, झिंडे ने सामने से हमला बोल दिया ताकि सबका ध्यान उस पर जाए। गोलियों की गूंज और शोर के बीच, नन्हीं अमाल अनु को पीछे के चोर दरवाजे से अंदर ले गई। अनु ने अपनी जान की परवाह किए बिना अंदर छलांग लगा दी।
अंदर एक दुश्मन आर्या पर हमला करने ही वाला था कि अनु ने वहाँ पड़ा एक भारी डंडा उठाया और उस गुंडे के सर पर दे मारा। अनु शेरनी की तरह अपने पति के सामने ढाल बनकर खड़ी हो गई। उधर बाहर झिंडे ने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे।
लेकिन खतरा अभी टला नहीं था। भागने का रास्ता बंद था। तब फिर से अमाल ने अपनी होशियारी दिखाई। उसने एक पुरानी सुरंग का रास्ता खोला जो सीधा जंगल की तरफ निकलता था। अनु ने घायल आर्या को अपने कंधे का सहारा दिया, झिंडे ने पीछे से कवर फायर दिया और अमाल आगे-आगे मशाल लेकर रास्ता दिखाती रही।
इन तीनों की हिम्मत ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिया। अनु का प्यार, झिंडे की वफादारी और अमाल की मासूमियत ने मिलकर मौत को मात दे दी। वे आर्या को सुरक्षित बाहर निकालने में कामयाब हो गए।
सुरक्षित जगह पहुँचने पर, अनु ने अमाल को गले लगा लिया और रोते हुए उसका माथा चूम लिया। अगर आज वो नन्हीं बच्ची नहीं होती, तो शायद अनु अपने आर्या को कभी वापस नहीं ला पाती। उस दिन कश्मीर की वादियों ने देखा कि कैसे तीन अलग-अलग लोगों ने मिलकर एक जिंदगी बचाई।
सच्चाई की जीत हुई और आर्यावर्धन अपनी अनु के पास सुरक्षित लौट आया।
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