अवैध सबंध की कहानी स्नेहा ओर गैर व्यक्ति अर्जुन के साथ की कहानी || अकेलापन गैर मर्द की तरफ आकर्षण
Автор: Story Ghar
Загружено: 2025-10-24
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अवैध सबंध की कहानी स्नेहा ओर गैर व्यक्ति अर्जुन के साथ की कहानी || अकेलापन गैर मर्द की तरफ आकर्षण
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कहानी: अधूरी प्यास
रोहन और स्नेहा की शादी को दस साल हो चुके थे। दोनों एक छोटे शहर में रहते थे। रोहन बैंक में मैनेजर था और स्नेहा गृहिणी। उनका एक बेटा आर्यन था, जो आठ साल का था। देखने में उनका परिवार बिल्कुल सामान्य और खुशहाल लगता था, पर अंदर ही अंदर रिश्तों की गर्माहट कम होने लगी थी।
रोहन रोज़ सुबह जल्दी निकलता और देर रात घर लौटता। घर लौटने पर अक्सर वह थका हुआ रहता और खाना खाकर तुरंत सो जाता। स्नेहा की कोशिश होती कि वह पति के साथ कुछ समय बिताए, बात करे, मगर रोहन के पास समय ही नहीं था। वह रोज़ एक ही जवाब देता—
“ऑफिस का बहुत दबाव है स्नेहा, समझा करो।”
धीरे-धीरे उनके बीच की बातचीत केवल जरूरी बातों तक सिमट गई। स्नेहा खुद को अकेला महसूस करने लगी। वह शायद कभी ये बात कह नहीं पाई कि उसे सिर्फ एक पति नहीं, एक दोस्त की भी ज़रूरत थी।
इसी दौरान स्नेहा ने एक ऑनलाइन कुकिंग क्लास जॉइन की। यहीं उसकी मुलाकात अर्जुन से हुई। अर्जुन पुणे में रहता था और एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था। वह स्नेहा की तरह ही कुकिंग का शौकीन था। क्लास खत्म होने के बाद जब ग्रुप चैट होती, तो दोनों अक्सर बात करते। अर्जुन हल्का-फुल्का मज़ाक करता, हंसता और हमेशा मन से बात करता था।
धीरे-धीरे चैटिंग लंबी होने लगी। बातों का सिलसिला सिर्फ खाना बनाने तक सीमित नहीं रहा। वे अपने-अपने जीवन के बारे में बात करने लगे। अर्जुन ने बताया कि उसकी पत्नी विदेश में नौकरी करती है और उससे अलग रहती है। घर में वह अकेला रहता है।
स्नेहा ने भी बताया—
“रोहन बहुत अच्छे इंसान हैं, लेकिन… शायद मुझे उनकी ज़रूरत से ज्यादा फुर्सत चाहिए… या थोड़ा प्यार।”
अर्जुन ने तुरंत जवाब दिया—
“कभी-कभी हम सही लोगों से होकर भी गुजरते हैं, मगर सही रिश्ता नहीं बना पाते।”
उस दिन स्नेहा बहुत देर तक सोचती रही। क्या वह अर्जुन से जुड़ती जा रही है? क्या वह किसी गलत दिशा में बढ़ रही है?
चैटिंग कॉल में बदल गई। कॉल रोज़ की आदत। आवाज़ों में अपनापन बढ़ता गया। अर्जुन जब कहता—
“तुम हंसती हो तो अच्छा लगता है।”
स्नेहा के मन में पिघलन सी महसूस होती। उसे लगता कि उसे कोई समझ रहा है, उसके दिल की बात सुन रहा है।
एक दिन अर्जुन ने कहा—
“स्नेहा, कभी पुणे आना हो तो बताना। मिलकर कॉफी पिएंगे।”
स्नेहा ने हंसकर कहा— “अब मैं कॉलेज की लड़की नहीं हूं कि अकेले कहीं चली जाऊंगी।”
“तो मैं आ जाता हूं,” अर्जुन बोला, “आखिर दोस्ती निभानी तो पड़ती है न।”
और दो हफ्ते बाद अर्जुन सच में उसके शहर आ गया।
पहली मुलाकात
स्नेहा ने अर्जुन को शहर के एक कैफे में बुलाया। दिल धड़क रहा था, हाथ ठंडे हो रहे थे। यह पहली बार था जब वह किसी और पुरुष से अकेले मिलने जा रही थी। अर्जुन आया— सादे कपड़ों में, मुस्कुराते हुए। उसकी आंखों में अपनापन था। वे देर तक बातें करते रहे— जिंदगी, रिश्ते, अधूरी इच्छाएँ… सब कुछ।
मुलाकात खत्म हुई तो अर्जुन ने कहा—
“तुम मिलकर बहुत अच्छा लगा। दिल हल्का हो गया।”
घर लौटकर स्नेहा आईने के सामने खड़ी रही। उसे खुद से सवाल करने पड़े— क्या यह एक गलती की शुरुआत है?
आने वाले दिनों में उनकी मुलाकातें जारी रहीं। कभी पार्क में, कभी कैफे में, कभी नदी किनारे। अर्जुन के साथ रहने पर स्नेहा खुद को ज़िंदा महसूस करती थी। उसे हंसना आने लगा था, खुद के बारे में सोचना आने लगा था।
इसमें सच्चाई थी, मगर समाज इसे गलत कहेगा।
इसमें भावनाएं थीं, मगर वचन नहीं।
इसमें अपना होना था, मगर पवित्रता नहीं।
एक दिन अर्जुन ने स्नेहा का हाथ पकड़ लिया। बस कुछ सेकंड के लिए। पर उस स्पर्श ने दिल के भीतर सोए ज्वालामुखी को जगाया।
स्नेहा ने धीरे से हाथ छुड़ाया
“अर्जुन, हम दोस्त हैं… बस दोस्त।”
अर्जुन ने कहा— “दिल किसी रिश्ते का नाम नहीं जानता स्नेहा।”
चुप्पी छा गई। रिश्ता वहीं बदल चुका था।
तूफान
दो दिन बाद रोहन अचानक जल्दी घर आ गया। उसने स्नेहा का फोन देखा, जिसमें अर्जुन का मैसेज था—
“Miss you.”
उसने गुस्से में फोन फेंक दिया। स्नेहा डर गई। रोहन ने पूछा
“कौन है अर्जुन? क्या रिश्ता है तुम्हारा उसके साथ?”
स्नेहा रो पड़ी— “वो… बस एक दोस्त है।”
रोहन चिल्लाया— “वो दोस्त नहीं है, वो वजह है तुम्हारे बदलने की!”
स्नेहा ने भी पहली बार रोहन से ऊंची आवाज़ में कहा—
“और आपकी वजह क्या है मेरे बदलने की? क्या कभी आपने वक्त दिया मुझे?”
रोहन कुछ नहीं बोला। घर का माहौल भारी हो गया। आर्यन डरकर अपने कमरे में चला गया। रिश्तों का घर टूटने लगा था।
रात को रोहन बाहर चला गया और देर रात लौटा। अगले दिन वह चुपचाप बैठा था। स्नेहा भी खामोश थी। कुछ देर बाद रोहन बोला—
“अगर तुम खुश नहीं हो तो मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं। चाहो तो जा सकती हो अर्जुन के पास।”
स्नेहा को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके दिल पर प्रहार किया हो। उसने शांत स्वर में कहा—
“रोहन, मैं किसी के साथ नहीं जाना चाहती। मैं सिर्फ समझा जाना चाहती थी। सुना जाना चाहती थी। प्यार किया जाना चाहती थी।”
रोहन की आंखें भर आईं
“और मैंने वह नहीं दिया… माफ करना।”
स्नेहा ने कहा
“मैंने भी गलती की। मुझे किसी और को नहीं, तुमसे बात करनी चाहिए थी।”
अंत नहीं—शुरुआत
स्नेहा ने अर्जुन को फोन किया।
“अर्जुन, हमारा रिश्ता खूबसूरत था, लेकिन अधूरा। मैं इसे गलत दिशा में नहीं जाने दूंगी। मैं अपने परिवार को एक मौका देना चाहती हूं।”
अर्जुन शांत था। उसने कहा
“तुम सही हो। सच प्यार वहीं पूरा होता है जहां जिम्मेदारी होती है। खुश रहना।”
कॉल कट गई। स्नेहा की आंख से एक आंसू गिरा—विदाई का आंसू।
उसने रोहन का हाथ पकड़ा और बोली—
“क्या हम फिर से शुरू कर सकते हैं?”
रोहन ने कहा—
“अगर तुम साथ हो, तो हां।”
दोनों ने आर्यन को गले लगाया। उस घर में एक बार फिर रिश्तों की खुशबू लौट आई।
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