मेरो संया निकर गयो मैं ना लरी || कबीर भजन || स्वर साध्वी मंजुला
Автор: ABHILASH SAHEB
Загружено: 2025-10-30
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कबीर विचार गोष्ठी सत्संग में आए विद्वानों के महत्वपूर्ण विचार 48वां वार्षिक सत्संग समारोह
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मेरो संया निकर गयो मैं ना लरी
✨ “मेरो संया निकर गयो, मैं ना लरी रे…”
यह भजन आत्मा की उस पुकार को दर्शाता है, जो अपने सैंया — परमात्मा, सद्गुरु या राम से बिछुड़ने के दर्द को महसूस करती है।
कबीर साहेब की यह वाणी हमें यह सिखाती है कि जब मन माया और अहंकार में उलझ जाता है, तब आत्मा अपने सच्चे प्रेमी — ईश्वर — से दूर हो जाती है।
💬 इस भजन में भाव है:
विरह में भी भक्ति की गहराई
माया से मुक्ति की चाह
सद्गुरु की शरण में स्थिरता
आत्मा और परमात्मा के मिलन की लालसा
🙏 सुनिए और अनुभव कीजिए कबीर साहेब की आत्मा को छूने वाली भक्ति।
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