Yamunashtak || यमुनाष्टक || યમુનાસ્ટક [ With Lyrics & Hindi Meaning ]
Автор: Bhori Kishori
Загружено: 2022-04-06
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Shri Yamunashtak || श्री यमुनाष्टक || Shri Hit Harivansh Mahaprabhu Ji [ Lyrics with Hindi Meaning ]
श्री यमुना जी का हृदय से ध्यान करते हुए जो वैष्णवजन इस यमुनाष्टक का प्रतिदिन भाव पूर्वक प्रातः, मध्यान, साँय तीनो काल पाठ करेगा, वह इस जन्म मे श्री राधावल्लभलाल जु के चरण- कमलों की उत्तम रस-भक्ति प्राप्त कर लेगा और देहपात के बाद उनकी प्राण- प्रिया श्री राधा रानी जु की सहचरी का पद निश्चय ही प्राप्त करेगा |
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आद्य ब्राह्म सिध्दाद्वैत श्री राधावल्लभीय संप्रदायाचार्य वन्शी अवतार अनन्त गोस्वमी श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी महाराज द्वारा कृत
( Yamunashtak By Hit Harivansh Ji )
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•• || श्री यमुनाष्टक || Shri Yamunashtak With Lyrics || ••
ब्रजाधिराजनन्दनांबुदाभगात्रचन्दना-
नुलेपगन्धवाहिनीम् भवाब्धिबीज्दाहिनीम् ॥
जगतत्र्ये यशस्विनीम् लसत्सुधा पयस्विनीम्
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ॥ १॥
रसैक सीमराधिका पदाब्ज -भक्ति साधिकां -
तदंग रागपिंजर प्रभाति पुंजमंजुलां |
स्वरोचिषाति शोभिताम कृतान्जनाधि गंजनाम
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् || २ ||
ब्रजेन्द्रसुनु-राधिका-हृदि प्रपूर्य माणयो
र्महारसाब्धिपूरयो रिवाति तीव्रवेगतः ||
वहिः समुच्छलन्नवप्रवाह - रूपिणीमहं
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् || ३ ||
विचित्ररत्न बध्दसत्तटद्वयश्रियोज्ज्वलां
विचित्र हंससारसाद्यनंत पक्षि संकुलां ||
विचित्र मीनमेखलां कृताति दीन पालितां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ||४||
वहन्तिकां श्रियां हरेर्मुदा कृपास्वरुपिणीं
विशुद्ध् भक्तिमुज्ज्वलां परे रसात्मिकां विदुः ॥
सुधा श्रुतिन्त्वलौकिकीं परेशवर्णरुपिणीं
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ॥५॥
सुरेन्द्रवृन्दवन्दितां रसादधिष्ठिते वने
सदोपलब्दमाधवाद्भुतैक सद्र सोन्मदां ॥
अतीव विव्हला मिवोच्चलत्त्न्गदोर्लतां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ॥६॥
प्रफुल्लपङ्कजाननां लसन्नवोत्पलेक्षणां
रथान्ग्नामयुग्मकस्तनी मुदारहन्सकां ॥
नितम्ब चारु रोधसां हरेप्रिया रसोज्ज्वलां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ॥७॥
समस्त वेदमस्तकैरगम्य वैभवां सदा
महामुनीन्द्र नारदादिभिः सदैव भावितां॥
अतुल्य पांरैरपिश्रितां पुमर्थसारदां
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम् ॥८॥
य एतदष्टकं बुधस्त्रिकाल माद्द्तः पठेत्
कलिन्दनन्दिनीं हृदा विचिन्त्यविश्ववन्दितां॥
इहैव राधिकापतेः पदाब्ज भक्ति मुत्तमा
मवाप्य स ध्रुवं भवेत्परत्र तत्प्रियानुगः ॥९॥
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम्
भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरन्तमोहभन्जिनीम्
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जय श्री राधे ....
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