Bahut Roya, sad urdu Ghazal (AI)
Автор: SAAZ-O-AHANG
Загружено: 2025-12-15
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नागाह वो रस्ते से, भटका तो बहुत रोया।
मुड़ मुड़ के मुझे देखा, समझा तो, बहुत रोया।
वो बरहमी में मुझ से हर रिश्ता भुला बैठा..।
जब पास मेरे एक दिन, आया तो, बहुत रोया
मंज़ूर न था उस को, हिजरत का ज़माना पर...।
नाचार ख़िज़ाँ रुत में बिछड़ा तो, बहुत रोया ।
उल्फ़त में शिकस्तो ग़म, लाज़िम है यक़ीनन वो
जब करबे जुदाई में टूटा तो बहुत रोया ।
पत्थर था तबीअत में, फ़ितरत में भी तलख़ी थी
वो नग़मा मेरा जब जब, गाया तो, बहुत रोया।
तक़दीर के कातिब ने, लिखा था शिकस्तो रेख़्त
जब अपने नसीबे का, पाया तो, बहुत रोया ।
मेरी ये नवा गोया, एक आह, है हिजरत की....।
इस आह को लफ़ज़ों में, ढाला तो बहुत रोया ।
मासूम था, नटखट था, जाना न तुझे 'फ़ाख़िर'...।
जब उस ने तुझे समझा, जाना, तो बहुत रोया
शायर: अहमद फ़ाखिर
note: AI द्वारा ग़ज़ल गायिकी से शब्दों के उच्चारण में गलतियां हुईं हैं, कृपया पुरी ग़ज़ल सामने रख कर सुने और भी आनंद आएगा। शुक्रिया
نوٹ:
اے آئی جنریٹر غزل گلوکارہ میں تلفظ اور درست الفاظ کی ادائیگی میں غلطی ہوئی ہے، براہ کرم غزل سامنے رکھ کر غزل سنیں تو لطف دوبالا ہوگا۔ شکریہ
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