कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढ़ूँढ़ै बन माहि। मोहि कपट छल छिद्र न भावा । श्री रामचरितमानस | कबीर दास जी
Автор: Rp Singh Jhala
Загружено: 2024-11-10
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कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढ़ूँढ़ै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं दुनिया जानत नाँहि।।
संत कवि मलूकदास कहते है
दया धर्म हिरदे बसै, बोलै अमृत बैन, जिनके हृदय में दया हो, धर्म हो, और बोली में प्रेम हो, वहा श्री राम विराजते है श्री रामचरितमानस मे श्री राम स्वयं कहते है ।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।
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