Are Ghas Ri Roti |अरे घास री रोटी | Pithal Aur Pathal | Kanhaiyalal Sethiya | Kavyandolan
Автор: Vivek Pareek
Загружено: 2020-04-16
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Kavyandolan : A Series of Poems
काव्यान्दोलन : अनुपम कविताओं की श्रृंखला
पीथळ और पाथळ । श्री कन्हैयालाल सेठिया
Pithal aur Pathal | Kanhaiya Lal Sethiya
यह कविता राजस्थानी साहित्य की एक अनुपम कृति है। जंगल में रह रहे महाराणा प्रताप अपने पुत्र की पीड़ा देख विचलित हो उठते हैं और अकबर को दासता स्वीकारोक्ति का पत्र लिख देते हैं।
कविता :
अरे घास री रोटी ही, जद बन बिलावडो ले भाग्यो ।
नान्हों सो अमरयो चीख पड्यो, राणा रो सोयो दुःख जाग्यो ।।
हूं लड्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै,
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैर्यां री खात खिडावण में,
जद याद करूँ हळदीघाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूँ
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूँ
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मैं’लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाल्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
अै हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां? हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूँ दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।(........)
Vocal : Vivek Pareek
D.O.P. Vipul Sinhmar
Special Thanks : Kalam Digital Studios
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