मध्य प्रदेश के मैहर जिले की जानकारी//Information about Maihar district of Madhya Pradesh
Автор: all india state information
Загружено: 2025-05-29
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सूचना : ---
यह लेख यह जिला मैहर (मईहर) के बारे में है। अरबी शब्द के लिए, महर देखें।
मैहर
मईहर
मैहर जिला मुख्यालय
माँ शारदा मन्दिर, मैहर
माँ शारदा मन्दिर, मैहर
देश भारत
राज्य मध्य प्रदेश
ज़िला मैहर
तहसील 3+3 अमरपाटन,अमदरा,बदेरा,मैहर, नादन ,रामनगर,
ऊँचाई 367 मी (1,204 फीट)
जनसंख्या (2020)
• कुल 7,42,901
समय मण्डल भामस (यूटीसी+5:30)
पिनकोड 485771
वाहन पंजीकरण MP 73
मैहर (Maihar) भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित एक जिला है। यह एक हिन्दू तीर्थस्थल है। जिला निर्माण 18 मार्च 2020 में कमलनाथ सरकार ने कैबिनेट प्रस्ताव से कर दिया था, किन्तु क्रियान्वयन प्रशासनिक तैयारी के साथ शिवराज सरकार ने 5 सितम्बर 2023 में प्रारम्भ किया। मैहर माँ शारदा की नगरी के साथ मध्य प्रदेश की संगीत नगरी और प्रमुख औद्योगिक नगर के रूप में विख्यात है। मैहर में नगर पालिका निगम कार्यरत है,जो 24 वार्डस से मिलकर बना है। जिले में 02 विधानसभा क्षेत्र है।वर्तमान में मैहर विधायक श्री श्रीकांत चतुर्वेदी है। जो भारतीय जनता पार्टी से चुनाव जीत कर आये। मैहर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 के माध्यम से रीवा संभाग से 65 कि. मी. की दूरी पर और उतनी ही दूरी पर कटनी जिले से भी है।
मैहर में शारदा माँ का प्रसिद्ध मन्दिर है जो नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य की पर्वत श्रेणियों की गोद में अठखेलियां करती तमसा के तट पर त्रिकूट पर्वत की पर्वत मालाओं के मध्य 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ऐतिहासिक मंदिर 108 शक्ति पीठों में से एक है। यह पीठ सतयुग के प्रमुख अवतार नृसिंह भगवान के नाम पर 'नरसिंह पीठ' के नाम से भी विख्यात है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आल्हखण्ड के नायक आल्हा व ऊदल दोनों भाई मां शारदा के अनन्य उपासक थे। पर्वत की तलहटी में आल्हा का तालाब व अखाड़ा आज भी विद्यमान है। यहाँ प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में दोनों नवरात्रों में यहां मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री मैहर आते हैं। मां शारदा के बगल में प्रतिष्ठापित नरसिंहदेव जी की पाषाण मूर्ति आज से लगभग 1500 वर्ष पूर्व की है। देवी शारदा का यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ स्थल देश के लाखों भक्तों के आस्था का केंद्र है माता का यह मंदिर धार्मिक तथा ऐतिहासिक है। वर्तमान में माँ शारदा शक्ति पीठ के प्रधान पुजारी पवन पाण्डेय जी है।
के जे एस के पास इच्छापूर्ति मंदिर पर्यटकों का दर्शनीय स्थल है ।
ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह स्वायम्भुव मनु की पुत्री प्रसूति से हुआ था। प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का अग्नि देव के साथ, स्वधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ, सती नामक एक कन्या का भगवान शंकर के साथ और शेष तेरह कन्याओं का धर्म के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे- श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति।
सती का जन्म, विवाह तथा दक्ष-शिव-वैमनस्य
दक्ष के प्रजापति बनने के बाद ब्रह्मा ने उसे एक काम सौंपा जिसके अंतर्गत शिव और शक्ति का मिलाप करवाना था। उस समय शिव तथा शक्ति दोनों अलग थे। इसीलिये ब्रह्मा जी ने दक्ष से कहा कि वे तप करके शक्ति माता (परमा पूर्णा प्रकृति जगदम्बिका) को प्रसन्न करें तथा पुत्री रूप में प्राप्त करें। तपस्या के उपरांत माता शक्ति ने दक्ष से कहा,"मैं आपकी पुत्री के रूप में जन्म लेकर शम्भु की भार्या बनूँगी। जब आप की तपस्या का पुण्य क्षीण हो जाएगा और आपके द्वारा मेरा अनादर होगा तब मैं अपनी माया से जगत् को विमोहित करके अपने धाम चली जाऊँगी। इस प्रकार सती के रूप में शक्ति का जन्म हुआ।
प्रजापति दक्ष का भगवान् शिव से मनोमालिन्य होने के कारण रूप में तीन मत हैं। एक मत के अनुसार प्रारंभ में ब्रह्मा के पाँच सिर थे। ब्रह्मा अपने तीन सिरों से वेदपाठ करते तथा दो सिर से वेद को गालियाँ भी देते जिससे क्रोधित हो शिव ने उनका एक सिर काट दिया। ब्रह्मा दक्ष के पिता थे। अत: दक्ष क्रोधित हो गया और शिव से बदला लेने की बात करने लगा। लेकिन यह मत अन्य प्रामाणिक संदर्भों से खंडित हो जाता है। श्रीमद्भागवतमहापुराण में स्पष्ट वर्णित है कि जन्म के समय ही ब्रह्मा के चार ही सिर थे।
दूसरे मत के अनुसार शक्ति द्वारा स्वयं भविष्यवाणी रूप में दक्ष से स्वयं के भगवान शिव की पत्नी होने की बात कह दिये जाने के बावजूद दक्ष शिव को सती के अनुरूप नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने सती के विवाह-योग्य होने पर उनके लिए स्वयंवर का आयोजन किया तथा उसमें शिव को नहीं बुलाया। फिर भी सती ने 'शिवाय नमः' कहकर वरमाला पृथ्वी पर डाल दी और वहाँ प्रकट होकर भगवान् शिव ने वरमाला ग्रहण करके सती को अपनी पत्नी बनाकर कैलाश चले गये। इस प्रकार अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी पुत्री सती द्वारा शिव को पति चुनने के कारण दक्ष शिव को पसंद नहीं करते थे।
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