*श्री भक्ति प्रकाश भाग [853]**भक्त किसे कहा जाता है।**भाग-२*
Автор: Bhakti me Shakti
Загружено: 2026-01-21
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Ram bhakti @bhaktimeshakti2281
परम पूज्य डॉ श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से
((1861))
धुन :
हम भक्तन के भक्त हमारे,हम भक्तन के भक्त हमारे ।।
हम भक्तन के भक्त हमारे,हम भक्तन के भक्त हमारे ।।
श्री भक्ति प्रकाश भाग [853]
भक्त किसे कहा जाता है।
भाग-२
परमेश्वर की घोषणा-हम भक्तों के हैं, भक्त हमारे हैं । उन्हीं भक्तों की चर्चा चल रही है साधक जनो ! स्वामी जी महाराज ने प्रथम भक्त राजा जनक को लिया है ।
कल आप जी से अर्ज़ की जा रही थी, भक्त वह जो भगवान् का है, जो संसार का है वह संसारी । जो नाम धन एकत्रित करता है, संतोष धन एकत्रित करता है, वह भक्त ।
जो नश्वर धन संपत्ति इकट्ठी करता है, वह संसारी । संसारी को संसार चाहिए, भक्त को भगवान् चाहिए । संसारी सांसारिक संपत्ति को ही ज़िंदगी भर अर्जित करता रहता है। सारी की सारी यहीं रह जाती है, साथ नहीं जाती । भक्त भगवान् की भक्ति को इकट्ठी करता रहता है, सारी की सारी शक्ति उसी में डाल देता है । उसे पता है कि यही मेरी संगी साथी है । लोक में भी एवं परलोक में भी, यही मेरे साथ जाएगी । नाम धन संचित करता है, अर्जित करता है, सत्कर्मों की पूंजी इकट्ठी करता है । मानो वह सब कुछ इकट्ठा करता है, जिसे परलोक की पूंजी कहा जाता है । जो ऐसा करता है उसे भक्त कहा जाता है । जो ऐसा नहीं करता, उसे संसारी कहा जाता है ।
जो बांटना ही बांटना चाहता है, आप सोचते हो कि भक्त नाम की पूंजी अपने लिए इकट्ठी कर रहा है, जिस नाम के आप उपासक हो देवियो सज्जनो ! एक बार यदि प्रेम पूर्वक उसे जपा जाता है तो वह जन्म जन्मांतरो के सारे के
आपके सारे कलमुष पाप इत्यादि जलाकर राख कर देता है । फिर लाखों की संख्या में, करोड़ों की संख्या में राम राम जपने की क्या आवश्यकता है ? वह भक्त नहीं जो अपने लिए ही सब कुछ कमाई कर रहा है । वह यह धन भी संचित करता है तो वह औरों के लिए, अपने लिए नहीं । पुण्यों की कमाई इकट्ठी करता है तो अपने लिए नहीं, औरों के लिए । जो औरों को बांटना ही बांटना चाहता है, उसे भक्त कहा जाता है ।
पैसा तो उसके पास होता नहीं । यहां पैसे की बात नहीं है । यह तो असली कमाई की बात है । वह क्या बांट रहा है, भक्त असली कमाई बांटता है । राम-राम जपता है, औरों को जपने की प्रार्थना करता है । अपनी कमाई भी देता है, लो ।
स्वामी जी महाराज नाम दान देते हैं, अपनी कमाई देकर, तो यूं कहिएगा कि परमात्मा के बैंक में हमारा अकाउंट खोल देते हैं । आप ही के नाम, जॉइंट अकाउंट नहीं, स्वामी जी महाराज अपना नाम साथ नहीं रखते । आप ही के नाम आपका अकाउंट खोल देते हैं, अपनी कमाई देकर । लो बेटा ! सब आप ही की रहेगी । जितनी मैं दे सकता था, उससे अधिक मैंने दे दी । अब आपकी बारी है । अपना डिपॉजिट अपने अकाउंट में जितना डालोगे, सब की सब कमाई आपकी, डालते रहना ।
औरों को सुख देता है वह भक्त । स्वयं दुःख सह कर भी औरों को सुख पहुंचाता है वह भक्त, औरों को सुखी देखकर जो सुख महसूस करता है वह भक्त । औरों को दुःखी करके एवं दुःखी देखकर जो सुखी होता है वह संसारी । ज़मीन आसमान का फ़र्क है साधक जनो ! यह बातें जो आपकी सेवा में कहीं जा रही हैं, यह कोई ऐसी मनगढ़ंत बातें, काल्पनिक बातें नहीं हैं । ऐसे लोग हैं संसार में, बहुधा ऐसे ही संसार में और बहुत दुःख हैं, और बहुत कारण हैं दुःख के, लेकिन एक कारण यह भी है कि अमुक व्यक्ति बड़ा सुखी है, यह संसारी है ।
भक्त तो उसी वक़्त, उसी समय, परमात्मा को शीश नवा देता है वहां । परमात्मा तूने इसे कितना सुखी बनाया हुआ है । तूने इसे कितना सुख दिया हुआ है ।
राजा जनक से साधक जनो ! ना चाहते हुए आज कोई अपराध हो गया । परमात्मा की बातें बड़ी निराली हैं, बड़ी अनोखी हैं । जो शब्द पत्नी को नहीं कहना चाहिए था, वह राजा जनक के मुख से निकल गया । अपमान भरा शब्द । इसलिए देवियो सज्जनो ! मुख खोलते वक्त, बोलने से पहले सोचो, समझो और फिर मुख खोलो । वह भक्त ही क्या जिसका मुख हर जगह खुल जाए ।
पूज्य श्री प्रेम जी महाराज कहा करते थे, जिसे मुख बंद करना नहीं आता, वह भक्त नहीं हो सकता । वह भक्त ही क्या ? जिसका आगे से मुख खुल जाए। वह तो मुख बंद रखना जानता है और वह भी राम राम जपते हुए । उसे पता है कि मैनें बाहर क्या निकालना है, अंदर क्या ले जाना है, वह भक्त है । अतएव बोलते वक्त हर एक को दूसरों का अपमान करने का अधिकार नहीं, दूसरों के दोष वर्णन करने का अधिकार नहीं, जो करेगा वह भरेगा, कोई छूट नहीं, कोई छुटकारा नहीं ।
आज ना चाहते हुए भी राजा जनक से, राजा जनक जैसा ज्ञानी, राजा जनक जैसा भक्त, कर्मयोगी, एक महापुरुष, गुरु महाराज, शुकदेव के गुरु, कौन शुकदेव ? महर्षि व्यास देव का पुत्र, उसके गुरु महाराज राजा जनक । आप पढ़ोगे परसों । छोटी मोटी हस्ती नहीं । पत्नी का अपमान हो
गया । परमेश्वर ने इसे अनदेखा नहीं किया। इसका अनदेखा करूंगा तो हर एक का मुख खुलना शुरू हो जाएगा ।
देखो परमात्मा को किन किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है । तेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह शोभा नहीं देता । तू बहुत उच्च स्तर पर है । लोग तुझे भक्त मानते हैं । लोग तुझे भक्तिनी कहते हैं । तेरा मुख इस प्रकार से खुलना संसार के लिए ठीक नहीं । क्या सजा निश्चित की जाए ? कोई सामान्य व्यक्ति होता तो मैं उसे नर्क देता, बेशक थोड़ी देर के
लिए । लेकिन तू परम भक्त है । प्रभु राम तेरे जमाई है, ससुर है तू उनका । कोई छोटी मोटी हस्ती नहीं । भगवान् श्री ने हुक्म दिया राजा जनक को नर्क के पास से निकाल दो बस ।
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