Bhagwad Gita Shloka | 4. 40 | संशय का अंत – विश्वास का आरंभ | श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद | AV202
Автор: ADHYATMIK VARSHA
Загружено: 2026-01-11
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🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग, श्लोक 40 👉 "अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥"
📖 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि अज्ञान, श्रद्धा का अभाव और संशय — ये तीनों ही मानव जीवन में विनाश के प्रमुख कारण हैं। जो संशय में जीता है, वह न इस लोक में सुख पाता है, न परलोक में, न ही आत्मिक शांति।
✨ इस वीडियो में आप पाएँगे:
संस्कृत श्लोक का उच्चारण 🪔
शब्दार्थ और भावार्थ 🪷
मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और वैज्ञानिक व्याख्या 🧠
आधुनिक जीवन में व्यावहारिक अनुप्रयोग 🧭
प्रेरणा और आंतरिक स्पष्टता का मार्ग 🌿
📌 Next Episode: अध्याय 4 के अगले श्लोक की गहराई में उतरते हैं — जहाँ ज्ञान और श्रद्धा से आत्मबल का निर्माण होता है।
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🙏 ध्यान रखें: संशय का अंत ही आंतरिक शांति की शुरुआत है।
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