17 - अवधूतोपाख्यान - 24 गुरुओं की कथा
Автор: Swami Shravananand Saraswati
Загружено: 2025-10-15
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🌞अवधूतोपाख्यान (24 गुरुओं की कथा)
🌼एकादश स्कन्ध मुक्ति स्कन्ध है। इसके सातवें अध्याय से ज्ञान, वैराग्य, भक्ति की तीन दिव्य धारा प्रवाहित हो रही है जिसके मुख्य श्रोता राजर्षि परीक्षित और वक्ता परमहंस शुकदेव गुरुदेव हैं।
🌼यहाँ संसारसे वैराग्य कैसे हो और कौन-कौन सी सावधानी की आवश्यकता है इसपर जोर दिया है। इसको उद्धवजी और श्रीकृष्ण के संवाद के द्वारा प्रस्तुत किया है, जिसके अंतर्गत (यदुवंश के पूर्वज) यदुजी और अवधूत दत्तात्रेय भगवान के संवाद का चित्रण किया गया है।
🌼जीवन ऐसा जीना चाहिये जिसको देखकर वैसा जीने का मन हो जाय। जैसे कोई संत,महात्मा का आनन्द देखे जो बिना किसी व्यक्ति, वस्तु और स्थान के भी आनंद में हैं और उसी आनन्द रस की प्राप्ति करने का मन हो जाए।अवधूत की यह विलक्षण स्थिति का दर्शन कर के ही राजा को जिज्ञासा हुई !
🌼श्रीमद्भागवत में उत्तम श्रोता ‘राजा’ हैं (जैसे राजर्षि परीक्षित, राजा रहुगण, यदुजी महाराज) और उत्तम वक्ता विरक्त परमहंस जिनके पास अपनी कुटिया तक नहीं है (जैसे श्री शुकदेव जी, जड़भरतजी, दत्तात्रेय भगवान)।
इसका तात्पर्य है की संसार का चाहे कोई कितना भी बल इकट्ठा कर ले किन्तु जिसके पास अध्यात्म बल है उसके सामने कोई कुछ भी नहीं है।
🌼आठवाँ गुरु कबूतर है। इसकी व्याख्या करते हुये श्री श्रीधरस्वामीपाद् महाराज कहते हैं- कबूतर जैसे पशु-पक्षी को भी आसक्तिवान नहीं होना चाहिए । तब मनुष्य के लिए कितनी सावधानी चाहिए क्योंकि मनुष्य शरीर सभी जीवों में श्रेष्ठ है और (भोग का नहीं) मोक्ष का द्वार है।
🌼’अति’ का सब जगह निषेध है। किसी भी क्रिया में अति नहीं होनी चाहिए। उदाहरणार्थ- वीणा के तारों को यदि ज़्यादा कस दिया जाये तो उसमें से स्वर नहीं निकलता और यदि ढीला छोड़ दिया जाये तब भी सही नहीं बजता। इसलिये हर जगह समता होनी चाहिए।
🌼श्लोक-
नातिस्नेहः प्रसंगो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित् ।
कुर्वन् विन्देत सन्तापं कपोत इव दीनधीः ॥
कहीं किसीके साथ अत्यन्त स्नेह अथवा आसक्ति नहीं करनी चाहिये, अन्यथा उसकी बुद्धि अपना स्वातन्त्र्य खोकर दीन हो जायेगी और उसे कबूतरकी तरह अत्यन्त क्लेश उठाना पड़ेगा ॥
(कबूतर अपने परिवार की चिंता करते-करते जान-बूझकर स्वयं बहेलिये के जाल में कूद पड़ा।)
-श्रीमद्भागवत 11-7-(52-74)
🌼यह मनुष्य शरीर मुक्ति का दरवाज़ा है यह नर्क जाने का नहीं मुक्तिद्वार है। पक्षी के समान घर में जो आसक्त हो गया, यह तो एसी ही बात है कि कोई ऊपर चढ़कर गिर जाये (आरूढ़च्युत)। यदि इससे मुक्ति नहीं प्राप्त कर पाये तो मानो बहुत बड़ा अवसर हाथ से निकल गया।
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