दु:ख जननी तृष्णा | लालच का भयानक परिणाम Hindi Moral Story - Jataka Tale 467
Автор: Amrit Gyan Gatha
Загружено: 2025-12-03
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एक राजकुमार जिसने राज्य और ऐश्वर्य को त्याग दिया, साधारण जीवन चुना… पर एक छोटी-सी तृष्णा ने उसकी शांति छीन ली।
लालच के बीज धीरे-धीरे उसके मन में इतने गहरे उतर गए कि वह पूरा राज्य, फिर और राज्यों की चाह में मानसिक रूप से बीमार पड़ गया।
तभी एक युवा वैद्य ने उसे जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझाया—
“अगर चार राज्य भी मिल जाएँ, तो क्या आप एक ही समय में चार थालियों में भोजन कर पाएंगे?”
यही प्रश्न उसके भीतर सोई बुद्धि को जगा गया।
उसे समझ आया कि कामनाओं का कोई अंत नहीं।
वास्तविक सुख संतोष में है, तृष्णा में नहीं।
✨ कहानी का संदेश:
तृष्णा ही लालच की जड़ है।
जितना पाओ, मन और अधिक चाहता है।
सच्ची विजय अपने मन और इच्छाओं पर नियंत्रण में है।
❓ प्रश्न आपके लिए:
आपके अनुसार—जीवन का सबसे बड़ा शत्रु लालच है या असंतोष?
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